सुप्रीम कोर्ट ने जहाज के किराये से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि बेयरबोट चार्टरपार्टी में वैध टर्मिनेशन नोटिस जारी हो जाने के बाद करार खत्म हो जाता है। इसके लिए जहाज को तुरंत वापस कब्जे में लेना जरूरी नहीं है। यानी मालिक ने करार खत्म करने की तय प्रक्रिया पूरी कर दी, तो सिर्फ जहाज उसके कब्जे में न आने से करार जारी नहीं माना जाएगा।
बेयरबोट चार्टर आखिर होता क्या है?
बेयरबोट चार्टर में जहाज का मालिक अपना खाली जहाज एक तय अवधि के लिए दूसरे पक्ष को किराये पर देता है। जहाज के साथ चालक दल, जरूरी सामान या मास्टर नहीं दिया जाता। इसे ही डिमाइज चार्टर भी कहा जाता है। इसमें जहाज का पूरा कब्जा और नियंत्रण चार्टरर के पास रहता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बड़ी बातें
वैध टर्मिनेशन नोटिस करार खत्म करने के लिए पर्याप्त है। जहाज का भौतिक कब्जा वापस लेना जरूरी शर्त नहीं है।
कब्जा मिलने में देरी से मालिक का अनुबंध खत्म करने का अधिकार नहीं रुकेगा। भौतिक कब्जा बाद में नियंत्रण के व्यावहारिक हस्तांतरण को पूरा करता है।
विवाद शुरू कैसे हुआ?
मामला जहाज एमवी नेरियस प्रोग्रेस से जुड़ा है। जहाज के मालिक ने नेरीडीज मरीन सर्विसेज को अक्टूबर 2024 में बेयरबोट चार्टरपार्टी के तहत जहाज दिया था। बाद में किराये की रकम का भुगतान नहीं हुआ। मालिक ने पहले मांग नोटिस भेजे। फिर भुगतान की कमी दूर करने के लिए तीन बैंकिंग दिनों का अतिरिक्त समय दिया गया।
फिर मालिक ने क्या कदम उठाया?
भुगतान नहीं हुआ तो मालिक ने 13 नवंबर 2025 को टर्मिनेशन नोटिस जारी कर दिया। इसके बाद जहाज वापस लेने का नोटिस भी दिया गया। इसी बीच जहाज तूतीकोरिन पहुंच गया। लेकिन मालिक उसे अपने कब्जे में ले पाता, उससे पहले ही एक नया विवाद खड़ा हो गया।
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मामले में आगे क्या हुआ?
- 4 दिसंबर 2025 को ओम फ्रेट फॉरवार्डर्स लिमिटेड ने मद्रास हाईकोर्ट से जहाज को जब्त करने की मांग की। कंपनी का दावा था कि नेरीडीज अभी भी जहाज का डिमाइज चार्टरर था।
- इसी आधार पर जहाज को नौवाहन विभाग कानून के तहत जब्त करने की मांग की गई। मद्रास हाईकोर्ट ने आदेश के जरिए जहाज को जब्त करने की अनुमति दी। मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मालिक ने करार के मुताबिक टर्मिनेशन की प्रक्रिया पूरी की थी। भुगतान में डिफॉल्ट भी नेरीडीज ने विवादित नहीं किया था। ऐसे में 13 नवंबर 2025 का टर्मिनेशन नोटिस वैध था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहाज पर भौतिक कब्जा बाद में मिला या नहीं, इससे करार खत्म होने का असर नहीं बदलता।
अगर कब्जा जरूरी मानते तो क्या दिक्कत होती?
सुप्रीम कोर्ट ने इसके व्यावहारिक पहलू पर भी गौर किया। जहाज कहां है, उसे किस बंदरगाह पर खड़ा करना है, चालक दल सहयोग करेगा या नहीं या तकनीकी दिक्कत वास्तविक है या जानबूझकर पैदा की गई है? इन चीजों पर मालिक का पूरा नियंत्रण नहीं होता। इसलिए सिर्फ कब्जा मिलने को करार खत्म होने की शर्त मानना ठीक नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने आखिर क्या आदेश दिया?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। साथ ही की एमवी नेरियस प्रोग्रेस की जब्ती भी हटा दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैध टर्मिनेशन नोटिस से डिमाइज चार्टर खत्म हो गया था। जहाज का भौतिक कब्जा बाद में लेना सिर्फ नियंत्रण का व्यावहारिक हस्तांतरण पूरा करने की प्रक्रिया थी।