बीते हफ्ते चुनाव आयोग ने पांच राज्यों तमिलनाडु, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश तथा केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में वोटरों को अपना फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख बढ़ा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से उत्तर प्रदेश और केरल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए समय बढ़ाने की मांग वाले निवेदनों पर विचार करने को कहा।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ को वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने बताया कि अकेले उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से 25 लाख नाम हटा दिए गए हैं। सिब्बल ने कहा कि कुछ मामलों में पति का नाम होता है और पत्नी का नाम नहीं होता।
कपिल सिब्बल ने यह भी बताया कि एसआईआर फॉर्म जमा करने की समय सीमा भी खत्म हो रही है। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया 3 दिसंबर को समाप्त होने वाली है। चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि इन चीजों को चुनाव आयोग पर छोड़ देना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि समय सीमा पहले ही बढ़ा दी गई है। एक वकील ने जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं, फिर भी चुनाव आयोग पर्याप्त समय नहीं दे रहा है।
पीठ ने प्रस्तुत दलीलों पर ध्यान दिया और चुनाव आयोग से जमीनी हकीकतों को ध्यान में रखते हुए समय बढ़ाने की मांग करने वाली किसी भी याचिका पर सहानुभूतिपूर्ण फैसला लेने को कहा। पीठ ने विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर अंतिम सुनवाई 6 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी।
उस दिन द्विवेदी चुनाव आयोग की ओर से अंतिम दलीलें पेश करना शुरू करेंगे। 11 दिसंबर को याचिकाकर्ताओं में से एक ने कहा था कि चुनाव आयोग 'शक करने वाले पड़ोसी' या 'पुलिसकर्मी' की भूमिका नहीं निभा सकता, जो मतदाताओं के साथ संदेहपूर्ण व्यवहार करे।
एसआईआर प्रक्रिया का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने कहा था कि चुनाव आयोग का संवैधानिक जनादेश मतदान अधिकारों के सूत्रधार और प्रवर्तक के रूप में कार्य करना है।