सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकारों से पूछा है क्यों नहीं अस्पतालों द्वारा मरीजों को दवाई और चिकित्सकीय उपकरण अपनी ही दुकान से खरीदने के लिए मजबूर करने पर पाबंदी लगा दी जाएगी।
न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर की पीठ ने इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका पर परीक्षण करने का निर्णय लिया है। याचिका को जन हित में बताते हुए पीठ ने केंद्र और सभी राज्य व केंद्रशासित प्रदेशों को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
विधि केछात्र सिद्धार्थ डालमिया की ओर से दायर इस जनहित याचिका में कहा गया है कि यह एक ऐसी समस्या है जिससे हर मरीज और उनके तीमारदारों को जूझना पड़ता है। याचिका में सिद्धार्थ ने कहा कि मां की सर्जरी और स्तर कैंसर केइलाज में अब तक वह 15 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं।
इलाज के दौरान उन्होंने यह महसूस किया कि अस्पताल, नर्सिंग होम या चिकित्सा सेवा देने वाले संस्थान मरीजों को किस प्रकार लूटते हैं। अस्पतालों द्वारा मरीज व उनके तीमारदारों को मजबूर किया जाता है कि वे दवाइयां और चिकित्सा उपकरण परिसर में स्थित उनके ही फार्मेसी से ही खरीदें। इतना ही नहीं उन फार्मेसी में एमआरपी में चीजें मिलती हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह दवा निर्माताओं के सांठ-गांठ से होता है।
याचिका में कहा गया है कि अब तक इस पर रोकथाम केलिए कोई कानून या पॉलिशी नहीं है, लिहाजा अस्तपाल आम लोगों को लूट रहे हैं। सरकार इस मामले में लोगों को संरक्षण देने में नाकाम रही है।