फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट: लाइव सुनवाई के वीडियो का गलत इस्तेमाल करने वालों पर होगी कार्रवाई, केंद्र को क्या निर्देश दिए?

Fri, 30 Oct 2026 04:00 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि अदालतों की लाइव सुनवाई के वीडियो का बिना अनुमति इस्तेमाल करने, उनमें बदलाव करने और उनसे कमाई करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान नीति में शामिल किया जाए। अदालत ने मीडिया की रिपोर्टिंग पर रोक से इनकार किया है। ऐसे में सवाल है कि नए नियम कैसे लागू होंगे? क्या वॉटरमार्क और डिजिटल हस्ताक्षर से फर्जी वीडियो की पहचान आसान हो सकेगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

विज्ञापन
लाइव सुनवाई की रिकॉर्डिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के वीडियो और ऑडियो को सोशल मीडिया पर बिना अनुमति इस्तेमाल करने, उनमें बदलाव करने और उनसे कमाई करने के मामलों पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान रिकॉर्ड की गई अदालती कार्यवाही के वीडियो का अनधिकृत इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान नई नीति में शामिल किया जाए। अदालत का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सुनवाई के वीडियो को तोड़-मरोड़कर पेश न किया जाए और उनका इस्तेमाल निजी प्रचार या कमाई के लिए न हो।

विज्ञापन


सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को क्या निर्देश दिया?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि प्रस्तावित नीति में नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के जरूरी उपाय शामिल किए जाएं। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने यह निर्देश तब दिया, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि विभिन्न हाईकोर्ट और दूसरे संबंधित पक्षों से सुझाव मिल चुके हैं। इन सुझावों को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) को भेज दिया गया है। मंत्रालय इन पर विचार करके व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करेगा। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मंत्रालय कुछ दिनों में अपना जवाब दे सकता है और मामले को दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया।

अदालत के वीडियो के इस्तेमाल पर पहले से क्या पाबंदी है?
सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई को निर्देश दिया था कि उसकी या हाईकोर्ट की सुनवाई के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को बिना अनुमति निकालना, साझा करना, अपलोड करना, दोबारा पोस्ट करना, प्रसारित करना, उसमें बदलाव करना या उससे कमाई करना प्रतिबंधित होगा। इसके अलावा ऐसी रिकॉर्डिंग को डिजिटल मंचों पर संग्रहित करने या होस्ट करने पर भी रोक लगाई गई थी। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के महासचिव या संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति जरूरी बताई गई थी। 18 सितंबर को अदालत ने इन निर्देशों को स्पष्ट करते हुए कहा था कि इसका मतलब यह नहीं है कि मान्यता प्राप्त समाचार संस्थानों को अदालती कार्यवाही की खबरें देने से रोका जा रहा है। समाचार संस्थान सुनवाई और कानूनी घटनाक्रम की रिपोर्टिंग कर सकते हैं, लेकिन वे अपनी खबरों में सुनवाई के ऑडियो-वीडियो क्लिप का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
विज्ञापन


फर्जी और एडिट किए गए वीडियो पर रोक लगाने के लिए क्या सुझाव दिया गया?
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी अदालत के सामने एक सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि अदालत की ओर से जारी किए जाने वाले हर आधिकारिक वीडियो पर ऐसा डिजिटल हस्ताक्षर या वॉटरमार्क होना चाहिए, जिसकी सत्यता की जांच की जा सके। इससे आम लोग और डिजिटल मंच यह पहचान सकेंगे कि कौन-सा वीडियो असली है और किसके साथ छेड़छाड़ की गई है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अदालत की सभी कार्यवाहियों के वीडियो सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रमाणित और वॉटरमार्क वाले रूप में उपलब्ध कराए जाएं। इससे असली वीडियो की पहचान करना आसान होगा और उनमें बदलाव करके गलत जानकारी फैलाने की आशंका कम हो सकेगी।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया की रिपोर्टिंग पर भी रोक लगाई है?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि उसके निर्देशों का उद्देश्य मीडिया की रिपोर्टिंग पर रोक लगाना नहीं है। 9 अक्तूबर को सुनवाई के दौरान पीठ ने दोहराया था कि अदालत की कार्यवाही की रिपोर्टिंग या लाइव स्ट्रीमिंग को बंद करने का कोई सवाल नहीं है। मान्यता प्राप्त समाचार संस्थान अदालत में होने वाली सुनवाई और कानूनी घटनाक्रम की खबरें प्रकाशित कर सकते हैं। हालांकि, वे अपनी रिपोर्टिंग में सुनवाई के ऑडियो-वीडियो क्लिप का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अदालत की चिंता उन लोगों और डिजिटल मंचों को लेकर है, जो बिना अनुमति वीडियो निकालकर उन्हें एडिट करते हैं, भ्रामक कैप्शन लगाते हैं या सोशल मीडिया पर प्रसारित करके उनसे कमाई करते हैं। यानी अदालत ने खबर देने और अदालत की रिकॉर्डिंग का अनधिकृत इस्तेमाल करने के बीच अंतर स्पष्ट किया है।

वकीलों के निजी प्रचार और वीडियो से कमाई पर अदालत ने क्या चिंता जताई?
9 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की रिकॉर्डिंग के व्यावसायिक इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई थी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि लाइव स्ट्रीमिंग के वीडियो का निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करने से बार, बेंच और पूरी न्यायिक संस्था को नुकसान पहुंचा है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी इस बात पर चिंता जताई थी कि कुछ वकील अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल अपना प्रचार करने और पेशेवर लाभ हासिल करने के लिए कर रहे हैं। अदालत के अनुसार, सुनवाई के वीडियो पर विज्ञापन लगाकर कमाई करना, निजी प्रचार करना और गलत जानकारी के साथ उन्हें प्रसारित करना न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के खिलाफ है। इसी मुद्दे पर अदालत में याचिकाएं दाखिल की गई हैं, जिनमें सुनवाई के वीडियो के अनधिकृत इस्तेमाल और व्यावसायिक शोषण को रोकने की मांग की गई है। अब केंद्र सरकार को तैयार होने वाली नीति में नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी शामिल करना होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें