सुप्रीम कोर्ट ने निकाह, तलाक और अन्य मामलों पर फैसले के लिए गठित की जा रही शरई अदालतों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करने वाली एक नई याचिका स्वीकार कर ली है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने याची जिकरा से कहा कि बहुविवाह और निकाह हलाला के मामले पर चल रही सुनवाई में पक्षकार बनने के लिए नए सिरे से अर्जी दाखिल करें।
सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में सुन्नी मुस्लिमों में प्रचलित तीन तलाक की परंपरा को खत्म करने का फैसला सुनाया था। इसके बाद 26 मार्च को शीर्ष अदालत ने फैसला किया कि बहु-विवाह और निकाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पांच सदस्यीय संविधान पीठ सुनवाई करेगी।
मुसलमानों में बहुविवाह की प्रथा एक पुरुष को चार महिलाओं से निकाह का अधिकार देती है। वहीं, निकाह हलाला में अगर एक पुरुष अपनी पत्नी को तलाक देने के बाद फिर उसी से शादी करना चाहता है, तो महिला को पहले किसी दूसरे पुरुष से विवाह कर यौन संबंध बनाने होंगे। फिर दूसरे पति से तलाक लेकर इद्दत की अवधि गुजारने के बाद ही वह पहले पति से विवाह कर सकती है।
उत्तर प्रदेश की जिकरा (21) दो बच्चों की मां हैं। उनकी ओर से अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय कोर्ट में पेश हुए। जिकरा ने अर्जी में धारा-498ए के तहत तीन तलाक को क्रूरता, जबकि निकाह हलाला, निकाह मुताह और निकाह मिस्यार को धारा-375 के तहत बलात्कार घोषित करने की मांग की है। अर्जी में कहा गया है कि बहुविवाह आईपीसी की धारा-494 के तहत अपराध है, जबकि भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ निकाह-हलाला और बहुविवाह की अनुमति देता है।
जिकरा को दो बार तलाक दिया गया तलाक
अर्जी में तीन तलाक, निकाह हलाला और अन्य कानूनों व परंपराओं के कारण जिकरा के शोषण का जिक्र है। जिकरा को दो बार तलाक दिया गया। फिर अपने ही पति से निकाह करने के लिए उन्हें निकाह हलाला से गुजरना पड़ा।
मौलिक अधिकारों का हनन हैं पर्सनल लॉ
जिकरा ने अर्जी में कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ और ऐसे ही अन्य पर्सनल लॉ संविधान में दिए मौलिक अधिकारों का हनन हैं। निकाह हलाला, निकाह मुताह और निकाह मिस्यार सामाजिक नियमों, नैतिकता और स्वास्थ्य के लिए घातक हैं। महिलाओं को सम्मान के साथ जीने, समानता की रक्षा, लिंग व धर्म के आधार पर भेदभाव से बचाने के लिए इन परंपराओं को खत्म किया जाना चाहिए।