एक दार्शनिक हमेशा इन सवालों में उलझा रहता है कि जीवन का आखिरी उद्देश्य क्या होता है। लेकिन मनोहर परिकर की जिंदगी अपने आप में इस सवाल का जवाब है कि एक इंसान अपनी जिंदगी कैसे सबसे बेहतर ढंग से जी सकता है। उनकी जिंदगी इस बात की भी मिसाल है कि कैसे एक इंसान एक राजनीतिक विचारधारा का व्यक्ति होने के बाद भी दूसरे के दिलों में अपने लिए सम्मानपूर्ण जगह बना लेता है।
मनोहर परिकर साहब से मेरा सबसे पहला परिचय एक पत्रकार के रूप में हुआ था। उस समय गोवा में भाजपा के पैर उतनी अच्छी तरह नहीं जमे थे। लेकिन जब एक मीटिंग करने के दौरान मैंने उन्हें लोगों से मिलते, बात करते देखा तब समझ आ गया था कि इस आदमी में कुछ खास है। हमारे लिए यह एक हैरत भरी बात थी कि जिस राज्य में लोग भारतीय जनता पार्टी को कम जानते थे, वहां लोग पार्टी से ज्यादा मनोहर परिकर को पहचानते थे। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उन्हीं के करिश्माई नेतृत्व की वजह से भाजपा ने गोवा जैसे राज्य में अपनी मजबूत पकड़ बनाई।
उनके रक्षामंत्री बनने के बाद कई बार उनसे मेरा मिलना हुआ। एक वाकया आज याद आ रहा है। जब वे रक्षामंत्री बने तब उन्होंने अपने आवास पर हमारे लिए एक छोटी सी पार्टी रखी। वहां पहुंचने के बाद बातों के बीच में उन्होंने बताया कि इस कमरे की सारी सजावट केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने करवाई थी। परिकर ने हमें बताया था कि उन्हें इन चीजों की समझ बहुत ज्यादा नहीं है। समझ के आलावा समय भी नहीं है कि वे इन बातों के बारे में सोचें। लेकिन मैं यह देखकर हैरान था कि भाजपा की मिट्टी किस प्रकार के नेता पैदा करती है।
हमारे सामने दो केंद्रीय मंत्री थे। एक ऐसा था जिसके पास अपने ही घर को ठीक तरह से रखने की फिक्र नहीं थी, तो दूसरा ऐसा था जो दूसरे मंत्री के घर की साज सज्जा पर भी ध्यान दे रहा था। ऐसा तो केवल परिवार में ही होता है जहां हर एक सदस्य दूसरे को तहेदिल से ध्यान रखता है। उसी दिन मुझे यह एहसास हो गया था कि ऐसे ही कार्यकर्ताओं नेताओं की वजह से भाजपा एक परिवार होने का दंभ भर्ती है।
किसी भी व्यक्ति के लिए यह एक रोमांचकारी कथा से कम नहीं है कि एक मुख्यमंत्री रहते हुए अंतिम दिन तक उन्होंने खुद को दूसरों की सेवा से अलग नहीं किया। कभी किसी के सामने यह राज जाहिर नहीं होने दिया कि वे खुद कितनी तकलीफ में हैं। ऐसी सादगी और ऐसी कर्मठता इतिहास में कभी कभी ही देखने को मिलती है। पूरे भाजपा परिवार के लिए यह गम में डूबने का समय है। लेकिन यह उसके लिए गर्व करने का दिन भी है कि उसके एक सपूत ने अपना सर्वस्व न्योछावर करते हुए अंतिम पल तक देश की सेवा की है।
(भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुदेश वर्मा से अमित शर्मा की बातचीत पर आधारित)