धीरे-धीरे बनने वाले सूखे के हालात अब अचानक बनने लगे हैं। ये घटनाएं पहले से कहीं ज्यादा विकराल हो रही हैं। एकाएक बनने वाली इन शुष्क परिस्थितियों को आकस्मिक सूखे के रूप में जाना जाता है।
जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन में वैज्ञानिकों ने आकस्मिक पड़ने वाले सूखे की वैश्विक घटनाओं में होने वाली वृद्धि के साथ-साथ उन क्षेत्रों की भी पहचान की है, जहां हाल के दशकों में स्थिति तेजी से बदतर हुई है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश के पैटर्न में आ रहे बदलावों को जिम्मेदार माना है। दक्षिण अमेरिका, विशेष रूप से दक्षिणी ब्राजील और अमेजन में आकस्मिक पड़ने वाला यह सूखा कहीं ज्यादा गंभीर रूप ले रहा है। यह परिस्स्थिति इस क्षेत्र में वनों में हो रहे भारी विनाश, बढ़ते तापमान और कम बारिश से मेल खाती है। प्रमुख शोधकर्ता और नासा की मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर में जलवायु वैज्ञानिक माहेश्वरी नीलम कहती हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में एकाएक पड़ने वाले इस सूखे द्वारा बड़े क्षेत्रों को लम्बे समय तक प्रभावित करते देखा गया है। उनके अनुसार प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली इन मापों का उपयोग आकस्मिक सूखे में तेजी से हो रहे बदलाव का पता लगाने में कर सकती है।
बाढ़ की घटनाओं में हो सकती है वृद्धि
शोधकर्ताओं का अंदेशा है कि इन बदलावों से अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है। इन क्षेत्रों में ऐसा पहले भी देखा गया है। आकस्मिक सूखे की यह घटनाएं अचानक उत्पन्न होती हैं। इसके प्रभाव लम्बे समय तक अनुभव किए जाते हैं। कुल मिलाकर यह परिस्थिति पानी और खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।
अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित
शोधकर्ताओं का कहना है कि अफ्रीका में कांगो, अंगोला, जाम्बिया, जिम्बाब्वे, दक्षिण अफ्रीका, लेसोथो और मेडागास्कर जैसे देश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। अफ्रीकी क्षेत्रों में बारिश की कमी से बढ़ता तापमान अधिक समस्याएं पैदा कर रहा है।
हिंदू कुश के आसपास सूखे में कमी आई
शोध में पता चला कि मध्य एशिया में हिमालयी कराकोरम, तियानशान और हिंदू कुश जैसे ऊंचे पहाड़ों के आसपास जलक्षेत्रों में आकस्मिक सूखे के विस्तार में गिरावट आई है। यह प्रभाव वैश्विक प्रवृत्ति से अलग है। इन क्षेत्रों में जलवायु में आ रहे बदलावों की वजह से बारिश में इजाफा हुआ है। वहां अब बर्फबारी की जगह बारिश ले रही है और बढ़ते तापमान की वजह से बर्फ पिघल रही है, नतीजन मिट्टी में नमी बरकरार है।