कुछ दिन पहले ही यूपीएससी के परिणामों का पिटारा खुला तो उसमें से निकलकर सफलता की ऐसी-ऐसी कहानियां सामने आईं कि देखने-सुनने वाले हैरत में पड़ गए। इन्हीं कहानियों के बीच से हम आपके लिए लेकर आए हैं कुछ ऐसी खास कहानियां जिन्हें पढ़कर आप खुद ब खुद हौसलों से भर उठेंगे। इन्हें पढ़कर आप जान सकेंगे कि मेहनत और जिद के आगे कोई भी चीज ऐसी नहीं है जिसे आप पा न सकें।
बिना आंखों की रोशनी के IAS की सीढ़ी चढ़ गई प्रांजल
यूपीएससी के एग्जाम में 124 वी रैंक हासिल करने वाली जेएनयू की रिसर्च स्कॉलर प्रांजल पाटिल मूल रूप से महाराष्ट्र की रहने वाली हैं। कम लोग ही जानते हैं कि देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा के टॉपरों में जगह बनाने वाली प्रांजल आंखों से देख नहीं सकती। उनकी इसी द्विव्यांगता के कारण साल 2015 में यूपीएससी की परीक्षा में 773 रैंक आने के बाद भी रेलवे मंत्रालय ने नौकरी देने से इंकार कर दिया। मंत्रालय का तर्क था कि सौ फीसदी दृष्टिहीन होने के कारण उन्हें नौकरी नहीं दी जा सकती। हालांकि इससे टूटने के बजाय प्रांजल दौबारा एकजुट हुई और इस साल 124वीं रैंक हासिल की।
एसएसपी के ड्राइवर का बेटा बना आईपीएस
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा सिविल सर्विसेज 2016 में सफल होने वाले हरिकेश के पिता यूं तो पुलिस महकमे में एक अदने से मुलाजिम ही हैं लेकिन उनके बेटे ने सिविल सर्विस की परीक्षा में 336वीं रैंक हासिल की है। हरिकेश के पिता मान सिंह मथुरा एसएसपी के ड्राइवर हैं। सिपाही पिता अपने अधिकारी को गाड़ी में ले जाते तो उनका रुतबा देखकर खुश हो जाते। बेटे को भी ऐसा ही बनाने की ठानी और हरिकेश ने भी पिता को निराश नहीं किया। पहले ही प्रयास में उन्होंने यह सफलता हासिल कर ली।
किसान का बेटा बना आईएएस, मिली 31वीं रैंक
यूपीएससी 2016 की मुख्य परीक्षा में बुलंदशहर के गांव खानपुर के रहने वाले किसान के बेटे गौरव सिंघल ने 31वीं रैंक प्राप्त कर साबित कर दिया कि प्रतिभाएं सिर्फ संसाधनों की मोहताज नहीं होती। पिछले साल यूपीएससी की परीक्षा में 565 वां स्थान पाने वाले गौरव सिंघल ने किसान पिता की मेहनत को मुकाम तक पहुंचाया। इससे पहले भी गौरव कई प्रतियोगिताओं में चयनित हो चुके हैं।
कोचिंग इंस्टीट्यूट नहीं घर पर पढ़कर आईएएस बनी ये बिटिया
उत्तराखंड के ऋषिकेश की रहने वाली नमामि बंसल इस पहाड़ी राज्य के युवाओं के लिए मिसाल बन गई हैं। नमामि ने सिविल सेवा परीक्षा में देशभर में 17वीं रैंक हासिल की है। यूं तो पिता की बर्तन की छोटी सी दुकान है, लेकिन बेटी की पढ़ाई पर दिल खोलकर खर्च किया। नमामि ने भी पिता की मेहनत को मुकाम दिया और आईएएस परीक्षा में सफलता पाई।
दिहाड़ी मजदूर का बेटा बना IAS, छोटी सी नौकरी के साथ पाई 574वीं रैंक
दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक नर्सिंग ऑफिसर (मेल नर्स) जोसफ के. मैथ्यू के पिता एक दिहाड़ी मजदूर रहे हैं। जीवनभर उन्होंने पिता का संघर्ष देखा और खुद भी उसी संघर्ष के बीच यूपीएससी का एग्जाम क्लियर किया। एम्स में दिनभर नौकरी करने वाले रात को समय निकालकर सिविल सर्विस की तैयारी करते थे। इससे पहले वह चार बार प्राथमिक परीक्षा पास कर चुके थे लेकिन सफलता नहीं मिली थी।
झुग्गी में पलकर आईएएस के मुकाम तक पहुंची उम्मल खैर
सिविल सेवा परीक्षा में 420वीं रैंक पाने वाली उम्मल खैर का बचपन हजरत निजामुद्दीन स्टेशन के पास झुग्गियों में बीता। उनके पिता स्टेशन के पास छोटे-मोटे सामान बेचा करते थे। कुछ सालों बाद झुग्गियां वहां से हटा दी गईं और उम्मुल का परिवार बेघर हो गया। पिता का काम छूटा तो सातवीं में पढ़ने वाली उम्मल ने ट्यूशन पढ़ाकर जैसे तैसे घर चलाना शुरू किया। एक दौर ऐसा भी आया था जब उम्मल की पढ़ाई बंद करने की बात भी की जाने लगी थी लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं मारी और घोर अभावों के बीच पलकर सिविल सेवा की परीक्षा पास की।