लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से जुड़े शोधकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययन से पता चला है कि जीका वायरस मानव त्वचा में मेटाबॉलिक बदलाव लाता है। इस वजह से त्वचा शरीर की रक्षा करने के बजाय और अधिक मच्छरों को आकर्षित करने लगती है। यानी यह बदलाव मच्छरों को आकर्षित करने के लिए चुम्बक की तरह काम करते हैं।
इन्सानी त्वचा पर स्थापित होकर जीका वायरस ऐसे रासायनिक संकेत भेजता है जो मच्छरों को अधिक आकर्षित करते हैं। इससे वायरस को तेजी से फैलने में मदद मिलती है।
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लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से जुड़े शोधकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययन से पता चला है कि जीका वायरस मानव त्वचा में मेटाबॉलिक बदलाव लाता है। इस वजह से त्वचा शरीर की रक्षा करने के बजाय और अधिक मच्छरों को आकर्षित करने लगती है। यानी यह बदलाव मच्छरों को आकर्षित करने के लिए चुम्बक की तरह काम करते हैं। अंतरराष्ट्रीय जर्नल कम्युनिकेशन्स बायोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार जीका वायरस त्वचा की कोशिकाओं (फाइब्रोब्लास्ट) में मौजूद जीन और प्रोटीन को परिवर्तित कर देता है। ये कोशिकाएं त्वचा को संरचनात्मक मजबूती प्रदान करने में सहायक होती हैं। इस बदलाव के कारण त्वचा से अधिक मात्रा में वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वीओसी) निकलने लगते हैं जो मच्छरों को आकर्षित करने और उन्हें अधिक काटने के लिए प्रेरित करते हैं। शोध के निष्कर्ष की पुष्टि के लिए मेटा-प्रोटिओम विश्लेषण विधि का उपयोग किया गया जो यह अध्ययन करती है कि शरीर में जीन और प्रोटीन किस प्रकार समन्वय के साथ कार्य करते हैं।
भारत सहित 90 से अधिक देशों में प्रसार
जीका वायरस सबसे पहले 1947 में युगांडा के बंदरों में पाया गया था। 1952 में युगांडा और तंजानिया में इन्सानों में इसके मामले सामने आए। अब तक इसके लिए कोई निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है। भारत सहित 90 से अधिक देशों में यह वायरस फैल चुका है।
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वायरस और इसके प्रभाव
जीका वायरस मच्छरों के काटने से फैलने वाली बीमारी है, जिसके लक्षण डेंगू से काफी मिलते-जुलते हैं। हालांकि यह गर्भवती महिलाओं से उनके बच्चों में भी संक्रमित हो सकता है। यह मुख्य रूप से एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। इसके अलावा असुरक्षित यौन संबंध, ब्लड ट्रांसफ्यूजन और अंग प्रत्यारोपण से भी वायरस फैल सकता है।
संक्रमित व्यक्ति में थकान, बुखार, लाल आंखें, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द और शरीर पर लाल चकत्ते जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। इसके लक्षण आमतौर पर हल्के होते हैं और दो से सात दिनों तक बने रहते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर जटिलताओं को जन्म दे सकता है।