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अध्ययन में खुलासा: धरती पर हर साल खोजी जा रहीं 16 हजार से ज्यादा नई प्रजातियां, जीवन की विविधता अब भी अनदेखी

Sat, 24 Jan 2026 04:52 AM IST
शिवम गर्ग अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

एक नए अध्ययन में सामने आया है कि वैज्ञानिक हर साल 16,000 से अधिक नई प्रजातियां खोज रहे हैं। यह दर विलुप्त होती प्रजातियों से कहीं ज्यादा है। 

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हर साल खोजी जा रहीं 16 हजार से ज्यादा नई प्रजातियां - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार
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वैज्ञानिक हर साल औसतन 16,000 से अधिक नई प्रजातियों की पहचान कर रहे हैं। यह न केवल अब तक की सबसे तेज रफ्तार है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि धरती पर जीवन की वास्तविक विविधता अभी भी बड़े पैमाने पर अज्ञात बनी हुई है। यह खोजें ज्ञान-वृद्धि के साथ संरक्षण, चिकित्सा और तकनीकी विकास के लिए भी निर्णायक साबित हो रही हैं।

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यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के नेतृत्व में किया गया अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने करीब 20 लाख ज्ञात प्रजातियों का विश्लेषण किया। निष्कर्ष बताते हैं कि 2015 से 2020 के बीच हर साल औसतन 16,000 से अधिक नई प्रजातियां वैज्ञानिक रूप से दर्ज की गईं। इनमें 10,000 से अधिक जानवर शामिल हैं, जिनका बड़ा हिस्सा कीटों और अन्य आर्थ्रोपॉड्स का है। इसके अलावा हर साल औसतन 2,500 नई पौधों की प्रजातियां और लगभग 2,000 नई फफूंद प्रजातियां भी दर्ज की गईं।

शोधकर्ताओं के अनुसार यह धारणा गलत साबित हो रही है कि नई प्रजातियों की खोज की रफ्तार धीमी पड़ गई है। अध्ययन की एक अहम बात यह है कि नई प्रजातियों की खोज की गति, प्रजातियों के विलुप्त होने की दर से कहीं अधिक है। अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक अन्य शोध के अनुसार हर साल औसतन लगभग 10 प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, जबकि इसके मुकाबले हजारों नई प्रजातियां वैज्ञानिक रिकॉर्ड में दर्ज की जा रही हैं।
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खोज मानवता के लिए अहम
नई प्रजातियों की पहचान केवल अकादमिक रुचि का विषय नहीं है। प्रोफेसर वाइन्स के अनुसार किसी भी प्रजाति के संरक्षण की पहली शर्त उसका वैज्ञानिक रूप से दर्ज होना है। जब तक किसी जीव का अस्तित्व आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक उसे बचाने की नीतियां भी नहीं बन सकतीं। इसके अलावा, जैव-विविधता चिकित्सा और तकनीक के लिए भी अनमोल संसाधन है। वजन घटाने की लोकप्रिय दवाओं में इस्तेमाल होने वाला जीएलपी-1 हार्मोन गिला मॉन्स्टर नामक छिपकली से प्रेरित है। इसी तरह मकड़ियों और सांपों के जहर तथा कई पौधे और फफूंद दर्द, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोगी साबित हो रहे हैं। कुछ जीवों की अनोखी क्षमताएं तकनीकी नवाचारों को भी प्रेरित कर रही हैं, जैसे गेको छिपकली के अत्यधिक चिपकने वाले पैर, जिनसे दीवारों पर चढ़ने वाले नए पदार्थ विकसित किए जा रहे हैं।

हॉटस्पॉट पहचानने के प्रयास
शोधकर्ता अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि नई प्रजातियां सबसे अधिक किन भौगोलिक क्षेत्रों में खोजी जा रही हैं, ताकि जैव-विविधता के अब तक अनदेखे ‘हॉटस्पॉट’ पहचाने जा सकें। इसके साथ ही यह भी अध्ययन किया जा रहा है कि क्या अब स्थानीय वैज्ञानिक अपने-अपने देशों की जैव-विविधता की खोज में पहले से अधिक भूमिका निभा रहे हैं। संदेश साफ है कि धरती पर जीवन की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। नई प्रजातियों की खोज केवल अतीत की वैज्ञानिक विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की अनिवार्य जरूरत है। क्योंकि अंततः वही जीव बच पाएंगे, जिन्हें हम जानेंगे और पहचानेंगे।
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