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चिंताजनक: भारी धातुओं से जहरीली हो रही मिट्टी, कृषि योग्य 16% भूमि प्रदूषित; बड़ी आबादी की सेहत भी खतरे में

Tue, 22 Apr 2025 05:00 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

पृथ्वी की कुल कृषि भूमि में से करीब 16 फीसदी हिस्सा भारी धातुओं के कारण प्रदूषित हो चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की मिट्टी में उपजने वाली फसलें जब मनुष्य और जानवर खाते हैं तो ये जहरीली धातुएं पूरे खाद्य शृंखला में प्रवेश कर जाती हैं, जिससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं जन्म लेती हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik
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विस्तार
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पृथ्वी की कुल कृषि भूमि में से करीब 16 फीसदी हिस्सा भारी धातुओं के कारण प्रदूषित हो चुका है। इस गंभीर संकट से न केवल खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ा है, बल्कि दुनिया की लगभग 140 करोड़ आबादी की सेहत भी खतरे में पड़ चुकी है। अध्ययन चीन, अमेरिका और ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने किया है, जिसके नतीजे अंतरराष्ट्रीय जर्नल साइंस में प्रकाशित हुए हैं।

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रिपोर्ट में दक्षिणी चीन, उत्तर व मध्य भारत और पश्चिम एशिया के कुछ क्षेत्रों को सर्वाधिक खतरे वाले जोन के रूप में चिह्नित किया गया है। इन इलाकों की मिट्टी में पहले से ही भारी धातुओं की मात्रा वैश्विक मानकों से कहीं अधिक पाई गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की मिट्टी में उपजने वाली फसलें जब मनुष्य और जानवर खाते हैं तो ये जहरीली धातुएं पूरे खाद्य शृंखला में प्रवेश कर जाती हैं, जिससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं जन्म लेती हैं।

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गंभीर बीमारियों का कारण बनती हैं भारी धातुएं
भारी धातुएं जैसे कि कैडमियम, आर्सेनिक, क्रोमियम, कॉपर, सीसा, निकल और कोबाल्ट या तो प्राकृतिक रूप से जमीन में पाई जाती हैं या फिर ये खनन, औद्योगिक गतिविधियों और रासायनिक कृषि के माध्यम से भूमि में प्रवेश करती हैं। ये तत्व परमाणु स्तर पर उच्च घनत्व वाले होते हैं और इसी वजह से दशकों तक मिट्टी में टिके रह सकते हैं। ये मिट्टी से फसलों में समाहित होकर शरीर में पहुंचते हैं और कैंसर, किडनी रोग, हड्डियों की कमजोरी, बच्चों में विकास संबंधी विकार जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं।
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2050 तक और गंभीर हो सकता है संकट
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि वर्तमान गति से मिट्टी का क्षरण, कीटनाशकों और रासायनिक खाद का अत्यधिक प्रयोग और औद्योगिक प्रदूषण जारी रहा तो 2050 तक दुनिया की 90 फीसदी मिट्टी संकट में आ सकती है। इसका सीधा असर वैश्विक खाद्य सुरक्षा, पोषण, और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा।

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