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चिंताजनक: दही के कप से लेकर खाने की पैकेजिंग तक जानलेवा, माइक्रोप्लास्टिक से फेफड़ों में कैंसर जैसे घातक बदलाव

Mon, 21 Jul 2025 07:53 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

जर्नल हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित यह अध्ययन पहली बार वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट करता है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि एक जैविक खतरा बन चुका है। दही के कप से लेकर खाने की पैकेजिंग तक जो प्लास्टिक हमारी रोजमर्रा की सुविधाओं का हिस्सा बन चुका है वही अब वैज्ञानिकों की नजर में एक गंभीर जैविक खतरा बनकर उभरा है। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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विएना से जारी एक चौंकाने वाले अध्ययन ने दुनिया को यह चेतावनी दी है कि जो प्लास्टिक रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी से इस्तेमाल हो रहा है, वही अब हमारे शरीर में सांसों के साथ घुसकर फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को कैंसर जैसी बीमारियों की ओर धकेल रहा है।

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जर्नल हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित यह अध्ययन पहली बार वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट करता है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि एक जैविक खतरा बन चुका है। दही के कप से लेकर खाने की पैकेजिंग तक जो प्लास्टिक हमारी रोजमर्रा की सुविधाओं का हिस्सा बन चुका है वही अब वैज्ञानिकों की नजर में एक गंभीर जैविक खतरा बनकर उभरा है। ऑस्ट्रिया स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ विएना के वैज्ञानिकों ने चेताया है कि हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक के महीन कण हमारे फेफड़ों की कोशिकाओं में कैंसर जैसे बदलाव पैदा कर सकते हैं। पॉलीस्टायरीन से बने सूक्ष्म प्लास्टिक कण  जिनका इस्तेमाल आमतौर पर खाद्य पैकेजिंग में होता है, फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को डीएनए क्षति, ऑक्सीडेटिव तनाव और कोशिका वृद्धि से जुड़े कैंसर-पथों में धकेल रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये कण विशेष रूप से स्वस्थ कोशिकाओं को प्रभावित कर रहे हैं, जबकि कैंसर कोशिकाएं अपेक्षाकृत अप्रभावित रहीं।  अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक बलाज डोमे ने कहा, स्वस्थ फेफड़ों की कोशिकाएं चिंताजनक तरीके से प्रतिक्रिया देती हैं।

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थक रही है रक्षा प्रणाली भी
शोध में पाया गया कि जब कोशिकाएं इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों के संपर्क में आती हैं तो वे अपने एंटीऑक्सिडेंट सुरक्षा तंत्र को सक्रिय करती हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे खुद को इस नवीन जैविक हमले से बचाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन यह प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं थी। वैज्ञानिक बुसरा एर्नहोफर ने बताया कि कोशिकाएं प्लास्टिक के तनाव से जूझ रही थीं, लेकिन वह सुरक्षा भी उन्हें घातक बदलावों से नहीं बचा सकी।
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दुनियाभर में फैला है प्लास्टिक का यह अदृश्य जाल
माइक्रोप्लास्टिक आज अंटार्कटिका की बर्फ से लेकर महासागरों की गहराइयों, पहाड़ों, मिट्टी, हवा, पानी और यहां तक कि मानव रक्त, मस्तिष्क और फेफड़ों तक में अपनी पैठ बना चुका है। यह अध्ययन उस खतरनाक मोड़ को दर्शाता है जहां केवल पर्यावरण ही नहीं, मानव शरीर भी प्लास्टिक प्रदूषण का शिकार बन चुका है।

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