स्वीडन के चाल्मर्स यूनिवर्सिटी के शोध में कहा गया है कि बिना समग्र योजना के इस तरह की नीति आर्थिक रूप से भारी पड़ सकती है। यह शोध भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, जहां हाइड्रोजन मोबिलिटी को लेकर तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।
2030 तक हर 200 किमी पर हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन बनाने की यूरोपीय संघ (ईयू) की बाध्यकारी नीति को लेकर अब विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थानीय जरूरतों और भूगोल को नजरअंदाज किया गया तो करोड़ों यूरो व्यर्थ जा सकते हैं।
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स्वीडन के चाल्मर्स यूनिवर्सिटी के शोध में कहा गया है कि बिना समग्र योजना के इस तरह की नीति आर्थिक रूप से भारी पड़ सकती है। यह शोध भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, जहां हाइड्रोजन मोबिलिटी को लेकर तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं। यूरोपीय संघ ने अलट्रानेटिव फ्यूल्स इंफ्रास्ट्रक्चर रेगुलेशन (एएफआईआर ) के तहत 2030 तक एक बाध्यकारी लक्ष्य तय किया है, हर 200 किमी पर हाइड्रोजन स्टेशन और हर शहर में कम से कम एक स्टेशन। उद्देश्य है कि भारी मालवाहक ट्रकों को हरित ईंधन विकल्प मिले। लेकिन चाल्मर्स यूनिवर्सिटी के अध्ययन में चेताया गया है कि यह ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ नीति कई देशों के लिए अनुपयुक्त और अत्यधिक खर्चीली साबित हो सकती है। फ्रांस जैसे ट्रैफिक घनीभूत देशों में हाइड्रोजन ढांचे की वास्तविक जरूरत ईयू की परिकल्पना से सात गुना अधिक पाई गई। जबकि ग्रीस, बुल्गारिया और रोमानिया जैसे देशों में अनावश्यक निवेश की आशंका जताई गई है। शोध में केवल दूरी नहीं बल्कि स्थलाकृतिक आंकड़ों को भी शामिल किया गया।
ऊर्जा की मांग का विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी से प्राप्त डाटा के आधार पर ट्रकों की ऊर्जा खपत को ऊंचाई और सड़क की ढलान के अनुसार मापा। इससे ऊर्जा की मांग का सटीक विश्लेषण हुआ, जो पारंपरिक मॉडल में नहीं दिखता। शोध में 6 लाख से अधिक मालवाहक मार्गों के आंकड़े शामिल किए गए। यह शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हाइड्रोजन एनर्जी में प्रकाशित हुआ है। इसे चाल्मर्स यूनिवर्सिटी के जोएल लोफ्विंग, सेल्मा ब्रायनॉल्फ और मारिया ग्रान ने तैयार किया है।
स्थानीय जरूरतों को समझना जरूरी
भारत भी राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन के तहत हरित हाइड्रोजन आधारित मोबिलिटी और बुनियादी ढांचे की ओर बढ़ रहा है। यह शोध भारत को सिखाता है कि हाइड्रोजन ढांचा बनाते समय ‘दूरी आधारित बाध्यता’ की जगह, देशीय भूगोल, यातायात घनत्व, ट्रकिंग पैटर्न और ऊर्जा मांग के वास्तविक आंकड़ों को ध्यान में रखा जाए। बिना स्थानीय जरूरतों को समझे यूरोपीय मॉडल अपनाने से आर्थिक नुकसान हो सकता है।