देश भर में बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के अगले महीने घोषित होने वाले परिणाम चौंकाने वाले होंगे। पिछले कई सालों के मुकाबले इस बार छात्रों के नंबर कम आएंगे। यह बारहवीं का पेपर लीक होने से कसी हुई मार्किंग की वजह से नहीं बल्कि दो दर्जन शिक्षा बोर्डों के कृत्रिम रूप से नंबर बढ़ाने की परंपरा खत्म करने के कारण से होगा।
पिछले कई दशकों से राज्यों के बोर्ड, सीबीएसई और आईसीएसई आदि अपने को एक-दूसरे से बेहतर दिखाने के लिए बारहवीं के छात्रों के नंबर ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ा दिया करते थे। बोर्ड इसे मॉडरेशन पॉलिसी कहते हैं।
अधिकतर मामलों में यह बढ़ोतरी आठ से दस फीसदी तक होती थी। यानी 95 फीसदी नंबर पाए छात्र के असली नंबर 85 फीसदी ही होते थे। इस वजह से दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों में दाखिले की कट ऑफ भी 99 और 100 फीसदी तक पहुंच जाती थी। नए नियम के बाद डीयू में दाखिले की कट ऑफ भी नीचे आएगी।
बिना तर्क की व्यवस्था
पिछले साल शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप ने जब सीबीएसई से इस परंपरा के पीछे का तर्क पूछा तो पता चला कि यह बहुत कम नंबर से फेल होने वाले बच्चों को पास करने के लिए दिए गए ग्रेस मार्क्स से शुरू हुई थी। या फिर प्रश्नपत्र में कोई प्रश्न गलत होने पर सभी छात्रों को उसके नंबर दे दिए जाते थे। बाद में हर बोर्ड बेहतर नतीजे देने के चक्कर में बिना वजह सभी छात्रों के नंबर बढ़ाने लग गए।