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जानिए, रक्षा में क्षेत्र में कहां जमीन-आसमान तलाश रही है मेक इन इंडिया परियोजना

Fri, 13 Dec 2019 09:43 PM IST
देव कश्यप शशिधर पाठक, नई दिल्ली

सार

  • सभी बड़ी परियोजनाएं विदेशी कंपनियों के पास
  • डीआरडीओ की गन को मिले स्थान तो होगी बड़ी बात
  • बुलेट प्रूफ जैकेट, हेलमेट, प्रेसराइज्ड मिसाइल कंटेनर जैसी रक्षा सौदे में हैं देशी कंपनियां
  • देशी रक्षा कंपनियां अभी भी ताक रही हैं मेक इन इंडिया का मुंह
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजना मेक इन इंडिया पर देश के रक्षा उद्योग की निगाहें टिकी हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इस परियोजना को लेकर केन्द्र सरकार पर तंज कसा है। इस तंज के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष को लोकसभा में घेरा, लेकिन जानिए कि मेक इन इंडिया अभी कहां है?

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रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार अभी मेक इन इंडिया की स्थिति आटे में नमक के बराबर है। डीआरडीओं के वैज्ञानिकों को भी नहीं पता कि जिस टोड आर्टिलरी गन को उन्होंने विकसित किया है और सात दिसंबर 2019 से इसका ट्रायल चल रहा है, वह कब सेना के बेड़े में शामिल हो पाएगी?

डीआरडीओ के वैज्ञानिक मुख्य युद्धक टैंक अर्जुन डेवलपमेंट प्रोग्राम से मिले अनुभव के बाद अभी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि सूत्र बताते हैं कि डीआरडीओ द्वारा विकसित टोड गन किसी भी अंतरराष्ट्रीय टोड गन से क्षमता में बेहतर है। यह पूरी तरह से देशी तकनीक पर देशी कंपनियों द्वारा तैयार की गई है। बताते हैं सेना के तीनों अंगो में अभी विदेशी रक्षा तकनीक की निर्भरता अधिक है।
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400 वज्रा के-9 गन लार्सन एंड ट्रुब्रो (कोरियन तकनीक) तो बोफोर्स तोप सौदे के दौरान हुए तकनीकी हस्तांतरण के तहत 400 धनुष तोप परियोजना को आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड पूरा कर रही है। आर्टिलरी को मजबूत बनाने के लिए 1500 (400-1100 तकनीकी हस्तांतरण के तहत) गन इस्राइल तकनीक की लेने की योजना है। सूत्र बताते हैं इसमें देशी गन के लिए अभी गुंजाइश काफी कम है।

डीआरडीओ की तोप


डीआरडीओ ने सेना की आर्टिलरी की स्थिति को देखते हुए 2012 में एडवांस टोड आर्टिलरी गन (155 एमएम और 52 कैलीबर) सिस्टम (एटीएजीएस) को विकसित करना शुरू किया था। डीआरडीओ के वैज्ञानिक बताते हैं कि इन गन को विकसित करने में टाटा डिफेंस और भारत फोर्ज तकनीकी साझीदार के रूप में शामिल किया गया था। अब यह तैयार हो चुकी है। इसका सात दिसंबर से सेना परीक्षण कर रही है। अगले सप्ताह तक परीक्षण पूरा हो जाने की उम्मीद है। बताते हैं डीआरडीओ की गन मानक के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय स्तर की तोपों से गुणवत्ता में अच्छी है। यह इस्राइल की सोल्टम से ली जाने वाली टोड गन से मारक क्षमता, रेंज, निशाने पर वार समेत अन्य मामले में अच्छी है। यह पूरी तरह से देशी तकनीक पर देशी रक्षा क्षेत्र की कंपनियों द्वारा तैयार हुई है, लेकिन अभी इसके भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

2014-2019 में देशी रक्षा उद्योग को मिले 1.96 लाख करोड़ के सौदे

पांच साल में रक्षा मंत्रालय ने लाखों करोड़ रुपये के रक्षा सौदों पर मुहर लगाई है, लेकिन इसकी तुलना में देशी रक्षा कंपनियों के हिस्से में केवल 1.96 लाख करोड़ के ही रक्षा सौदे आए हैं। मझगांव डाकयार्ड, गोवा शपियार्ड को फ्रिगट तो हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड को लाइट वेट हेलीकाप्टर की आपूर्ति का जिम्मेदारी मिली है। आडिनेंस फैक्टी बोर्ड 464 टी-90एस/एसकेएस टैंक तैयार करके सेना को देगी।

रक्षा मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक बीईएल को वायुसेना के लिए सात स्क्वाड्रान आकाश मिसाइल की आपूर्ति के लिए 6300 करोड़ रुपये का सौदा मिला है। एचएएल को 1410 करोड़ रुपये का 41 वायुसेना के लिए और 32 नौसेना के लिए लाइटवेट हेलीकाप्टर की आपूर्ति का सौदा मिला है। लार्सन एंड ट्रब्रो को 100 सेल्फ प्रोपेल्ड गन (155एमएम, 52 कैलीबर) की आपूर्ति का सौदा आवंटित हुआ है। इसी तरह से एमकेयू को सेना के हेलमेट, एसएम पल्प को 1.86 लाख बुलेट प्रूफ जैकेट की आपूर्ति का सौदा मिला है। इन सौदों पर नजर डालें तो अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के हाथ लगे हैं। निजी क्षेत्र की रक्षा कंपनियों के पास बस आटे में नमक के बराबर ही परियोजनाएं आई हैं।

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