दरअसल समर्थन के बाद विरोध में उतरने या चुप्पी साधने वाले सभी सहयोगियों का मुसलमान वर्ग में भी आधार है। सीएए के खिलाफ देशभर के मुसलमान बेहद नाराज हैं। सहयोगियों को लगता है कि ऐेसे में उसे सियासी घाटा उठाना होगा।
खासतौर पर बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संशोधित नागरिकता कानून पर और चर्चा की वकालत करते हुए एनआरसी को न कह दिया है। जबकि एजीपी खुल कर विरोध में है।
राजग में भी बिखराव
दूसरी ओर संसद में सबको साधने के बाद बिल पारित कराने में सफल हुई भाजपा अब इस पर सभी सहयोगियों को साधने में नाकाम रही है। संसद में बिल का समर्थन करने वाली असम गण परिषद ने सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जदयू ने इस पर और विचार की जरूरत बताई है।
वहीं, अकाली दल अब इस कानून में बदलाव चाहता है। संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले दूसरे सहयोगी लोजपा, अपना दल, आरपीआई जैसे दल चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा-कांग्रेस से समान दूरी रखने वाले वाईएसआर कांग्रेस और बीजेडी जैसे दल भी बिल पारित होने के बाद से लगातार चुप हैं।