उधम सिंह ने खुलेआम अपना गुनाह कबूल करते हुए लिखा कि,'मैंने उसे मारा क्योंकि मुझे उससे नफरत थी। वो इसी लायक था। मैं किसी समाज का नहीं। मैं किसी के साथ नहीं। मरने के लिए बूढ़े होने का इंतजार क्यों करना? मैं देश के लिए अपनी जान दे रहा हूं।' केवल दो महीने चले मुकदमे के बाद 31 जुलाई, 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।
उन दिनों उधम सिंह का नाम शेर सिंह हुआ करता था। 26 दिसंबर, 1899 को पंजाब के संगरूर गांव में उनका जन्म हुआ था। छोटी सी उम्र में ही माता पिता के निधन के बाद वो अनाथालय में पले-बढ़े। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की थी जब जालियांवाला के दर्दनाक कांड ने उनके जीवन को आजादी की लड़ाई की तरफ मोड़ दिया।
वो 'गदर' पार्टी से जुड़े और बाद में बड़े नेता के तौर पर उभरे। इसी बीच उन्हें 5 साल की जेल की सजा हुई थी। सजा काटने के दौरान लाहौर जेल में उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई, जिनसे वो बहुत प्रभावित हुए थे। जेल से निकलने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल कर 'उधम सिंह' रखा और पासपोर्ट बनाकर विदेश चले गए।
उधम सिंह अपने मिशन को अंजाम देने के लिए इतने समर्पित थे कि वे कई साल तक भेष बदल कर विदेश में रहे। इस दौरान एक तरफ दूसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा था और दूसरी तरफ उधम साउथैंपटन में सिंह आजाद के नाम से रह रहे थे। यहां वो सेना के लिए कैंप बनाने वाली कंपनी में काम करते थे।
उधम सिंह ने एलिफेंट बॉय और द फोर फेदर्स नाम की दो ब्रिटिश फिल्मों में भी काम किया, लेकिन किसी की मजाल नहीं थी कि उन्हें पहचान पाता। वहां अंग्रेजों की ज्यादती का विरोध करने के कारण वो पुलिस की नजरों में तो आ गए, लेकिन कभी किसी के हाथ नहीं आए। उनके पीछे ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी भी लगी हुई थी, लेकिन कोई उन्हें खोज नहीं पाया।
13 अप्रैल को मिशन पर निकलने से पहले उधम अपने मित्र और पिता समान बंदा सिंह से मिले थे। उधम ने भावुक हो कर अपने मित्र से कहा था कि भाई जी अपना सामान बांध लो और ये शहर छोड़ दो। मैं कुछ करने वाला हूं। मैं नहीं चाहता कि बाद में जो कुछ हो उसमें आप पकड़े जाओ।
बांदा सिंह मना करने पर उधम ने कहा "उसे मरना ही होगा और मुझे ही ये करना है"... इतना कह कर उधम सिंह ने अपनी आखिरी मुलाकात पूरी की और चल पड़े।