केंद्र सरकार ने आईएएस अफसरों के खिलाफ जांच रिपोर्ट भेजने के लिए जो प्रारूप तैयार किया था, उसके तहत राज्य काम नहीं कर रहे हैं। अनेक राज्यों ने आईएएस अफसरों के खिलाफ जांच रिपोर्ट भेजने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इतना ही नहीं, नए प्रारूप में रिपोर्ट भेजने से अधिकांश राज्य बचते हुए नजर आए। इसके चलते संबंधित अधिकारियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं हो सकी।
डीओपीटी ने इसी दिक्कत से बचने के लिए केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों और सभी राज्य सरकारों एवं संघ क्षेत्रों के प्रशासकों को जांच रिपोर्ट भेजने का एक निर्धारित प्रारूप भेजा था। इसमें कहा गया था कि जब भी कोई मंत्रालय या राज्य 'डीओपीटी' को आईएएस अधिकारी की जांच रिपोर्ट भेजेंगे तो उन्हें इसके लिए चार तरह के प्रारूप का इस्तेमाल करना होगा। इन्हीं में समस्त जांच रिपोर्ट भेजी जाएगी। इन प्रारूप में जांच से जुड़े तथ्य लिखने के लिए शब्दों की एक सीमा भी तय की गई थी। ज्यादातर कॉलम ऐसे थे, जिनमें हां या ना में जवाब देना था। इस प्रक्रिया में अनावश्यक फाइलों का बोझ कम हो जाता है। असामान्य और अकथनीय देरी से निजात मिलती है।
डीओपीटी ने अब 15 अक्तूबर को दोबारा से रिमाइंडर भेजकर आईएएस अफसरों के खिलाफ आने वाली शिकायतें और जांच रिपोर्ट, नए प्रारूप में भेजने के लिए कहा है। इसमें जांच से जुड़े तमाम तथ्य शामिल रहते हैं। मौखिक जानकारी को भी इसमें शामिल किया जाता है। जांच करने वाले अधिकारी के अलावा जांच करने का आदेश किसने और किन परिस्थितियों में जारी किया है, ये सब जानकारी नए प्रारूप में दी जाती है।
बयान किसके सामने दर्ज हुए हैं, क्या केस की कोई प्रारंभिक जांच रिपोर्ट है, संबंधित अधिकारी को निलंबित किया गया है, चार्जशीट में आरोपी अधिकारी का बयान शामिल है, आदि बातों के लिए प्रारूप में अलग-अलग कॉलम दिए गए हैं। जांच अधिकारी कौन है, उसकी नियुक्ति किसने की है और आरोपी अधिकारी ने क्या उसके खिलाफ कोई टिप्पणी की है, ये सूचना भी प्रारूप में दी जाती है। आरोपी को अपना पक्ष रखने के व्यक्तिगत तौर पर बुलाया गया था या ईमेल के माध्यम से लिखित में जानकारी माँगी गई थी, ये सब बातें भी प्रारूप में रहती हैं।