भारत के सबसे बड़े बैंक- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से लाखों लोगों का डेटा लीक होने की खबर है। आशंका जताई जा रही है कि एक अपरिचित हैकर समूह ने एसबीआई के सिस्टम में सेंध लगाकर उपभोक्ताओं के एक बड़े वर्ग का डेटा डार्क वेब पर डाल दिया। इनमें से हजारों ग्राहकों की निजी जानकारी भी मौजूद है।
इस डेटा लीक के बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बयान जारी कर कहा है कि उसने इस डेटा लीक की जांच शुरू कर दी है। बैंक का कहना है कि उसे इस डेटा सेंध की जानकारी अपने सेवा प्रदाता, साइबर एजेंसी और सर्ट-इन के जरिए मिली।
ऐसे में यह जानना अहम है कि स्टेट बैंक का लीक कितना बड़ा है? ग्राहकों की किन-किन जानकारियों के डार्क वेब पर रिलीज होने की बात सामने आई है? एसबीआई के सिस्टम से जानकारी लीक कैसे हुई? इसके पीछे किसके होने की आशंका जताई गई है? स्टेट बैंक इस संकट से निपटने के लिए क्या कर रहा है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- स्टेट बैंक का डेटा लीक कितना बड़ा है?
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) से उपभोक्ताओं के डेटा लीक की खबर मंगलवार से ही वायरल थी। बुधवार को नियामकों को दी गई जानकारी में बैंक ने शुरुआती जांच के आधार पर इससे जुड़े खुलासे किए।
स्टेट बैंक से डेटा लीक।
- फोटो : अमर उजाला
एसबीआई के बैंकिंग डेटा पर कितना असर पड़ा?
अमर उजाला ने इस मुद्दे पर साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट अविनाश जैन से बात की। अविनाश ने बताया कि नहीं, एसबीआई का कोर बैंकिंग सिस्टम हैक नहीं हुआ है। जो डेटा लीक हुआ है, वह मुख्य रूप से लोन एप्लिकेशंस, केवाईसी दस्तावेज या ऑन-बोर्डिंग रिकॉर्ड्स से जुड़ा हुआ है।
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एसबीआई के सिस्टम से जानकारी लीक कैसे हुई?
स्टेट बैंक की तरफ से यह आधिकारिक बयान उन कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स के बाद आया, जिसमें स्टेट बैंक का डेटा लीक होने के दावे किए गए थे। साइबरसिक्योरिटी मॉनिटरिंग अकाउंट साइबरपल्स56 ने एक्स पर ऐसे ही एक दावे का जिक्र किया था। इसमें कहा गया था कि एक हैकर ग्रुप सिरियुसिम के पास 3.8 लाख एसबीआई उपभोक्ताओं का डेटा सीएसवी (.csv) फॉर्मेट में मौजूद है। इसके अलावा 2722 पीडीएफ दस्तावेज मौजूद हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि साइबरपल्स56 ने पहली बार इस तरह के दावे को लेकर 16 अक्तूबर को आगाह किया था और कहा था कि सिरियुसिम ने डेटा संग्रह का पहला खुलासा करते हुए कुछ सामग्री सामने रख दी है।
एसबीआई डेटा लीक।
- फोटो : अमर उजाला
हालांकि, अब तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है कि किसी हैकर ग्रुप ने सच में एसबीआई में हैकिंग के जरिए यह डेटा चुराया या किसी और वजह से डेटा डार्क वेब पर लीक हुआ है।
स्टेट बैंक ने इस डेटा लीक पर क्या कहा है?
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने स्टॉक एक्सचेंजों को दी जानकारी में कहा है कि उसे 16 अक्तूबर को ही अपने थ्रेट इंटेलिजेंस सर्विस प्रोवाइडर, डिफेंस साइबर एजेंसी और सर्ट-इन (CERT-IN) से अपने उपभोक्ताओं के डेटा के डार्क वेब लीक होने से जुड़ा अलर्ट मिला था। बैंक ने कहा कि वह सर्ट-इन द्वारा मान्यता प्राप्त एक स्वतंत्र साइबरसिक्योरिटी एजेंसी से जांच करा रहा है, जिससे लीक का पूरा दायरा और इसकी वजह पता चलेगी।
बैंक ने यह भी कहा कि वह इस बात का विश्लेषण कर रहा है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है। एसबीआई ने स्पष्ट किया कि इस घटना से उसके मुख्य बिजनेस पर असर नहीं पड़ा है। न ही बैंक के वित्तीय प्रदर्शन और बिजनेस के रोजाना का लेनदेन इससे प्रभावित हुआ। यह बिना रुकावट के सामान्य स्तर पर जारी है।
स्टेट बैंक से हुए डेटा लीक से कितना बड़ा खतरा पैदा हुआ?
- लीक हुए डेटा में ग्राहकों के नाम, पते और मोबाइल नंबर शामिल हैं। पर्सनल डिटेल्स के आधार पर फर्जी आईडी बनवाने का जोखिम बढ़ जाता है, जिनके गलत इस्तेमाल की आशंका हमेशा बनी रहती है।
- इसके अलावा उपभोक्ताओं पर फिशिंग और सोशल इंजीनियरिंग अटैक का खतरा रहता है। ठग अकसर ग्राहकों का नाम और पता बताकर खुद को बैंक का प्रतिनिधि होने का नाटक करते हैं, जिससे ग्राहक उन पर आसानी से भरोसा कर लेते हैं और एटीएम पिन या ओटीपी साझा कर बैठते हैं।
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यह डेटा लीक होने के मुख्य संभावित कारण क्या हो सकते हैं?
अविनाश जैन के मुताबिक, डेटा लीक के पीछे तीन मुख्य कारण हो सकते हैं...
एसबीआई डेटा लीक।
- फोटो : अमर उजाला
थर्ड पार्टी वेंडर्स के साथ डेटा स्टोर करना क्यों खतरनाक?
भारत के इकोसिस्टम में थर्ड पार्टी वेंडर्स के साथ तीन बड़ी सुरक्षा कमियां देखने को मिलती हैं।
1. डेटा मिनिमाइजेशन की कमी: वेंडर को केवल काम की जानकारी देने के बजाय नाम, पता, आईएफएससी कोड, और अन्य संवेदनशील जानकारियां शेयर कर दी जाती है।
2. एक्सेस कंट्रोल का अभाव: सर्वर का एक्सेस सीमित अधिकारियों तक रहने के बजाय कई अनधिकृत लोगों के पास रहता है।
3. कमजोर निगरानी व्यवस्था: सिस्टम में मजबूत निगरानी तंत्र नहीं होता, जिससे डेटा लीक होने का समय पर पता नहीं चल पाता।
बैंकिंग और साइबर सुरक्षा सिस्टम कैसे डेटा लीक से बच सकते हैं?
अविनाश जैन के मुताबिक, जहां यूरोप और अमेरिका जैसे दुनिया में साइबर सिक्योरिटी को बनाए रखने और इसकी निगरानी के लिए सख्त कानून हैं, वहीं भारत में फिलहाल ऐसे ही एक कानून- डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (डीपीडीपी एक्ट, 2023) को लागू करने की तैयारी चल रही है।
अविनाश जैन, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट।
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उन्होंने कहा कि किसी भी आईटी या टेक्नोलॉजी सिस्टम में बदलाव करने से पहले उसकी नियमित सिक्योरिटी टेस्टिंग और समीक्षा अनिवार्य होना चाहिए। इसके अलावा बैंक या कंपनी में टेक/आईटी से जुड़े हर बदलाव को एक सिक्योरिटी पाइपलाइन से होकर गुजरना चाहिए।
बैंकिंग-वित्तीय संस्थानों में साइबर सुरक्षा चिंता का मुद्दा क्यों?
एसबीआई से डेटा लीक का यह मामला ऐसे समय में आया है, जब हाल के दिनों में बैंक और वित्तीय संस्थानों पर साइबर हमले बढ़े हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अक्तूबर की शुरुआत में साइबर अटैक की वजह से 20 बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) प्रभावित हुई थीं। यह स्पष्ट नहीं था कि इन साइबर हमलों में क्या जानकारी लीक या चोरी हुई, लेकिन इसे लेकर 9 अक्तूबर को भारत सरकार की साइबर सिक्योरिटी एजेंसी- सर्ट-इन (इंडियन कंप्यूट इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम) ने एक एडवायजरी जारी की थी। इसमें अनाधिकृत फंड ट्रासफर्स और क्रेडेंशियल्स की सुरक्षा को लेकर चेतावनी दी गई थी।
इसके अलावा रिजर्व बैंक (आरबीआई) भी लगातार बैंकों से अपनी साइबर सुरक्षा मजबूत करने की अपील करता रहा है। जुलाई 2026 में जारी दिशा-निर्देश के तहत बैंकों को अपने ऊपर हुए साइबर हमलों के बारे में दक्ष (DAKSH) प्लेटफॉर्म के जरिए नियामकों को जानकारी देना जरूरी है। वह भी साइबर हमले का पता लगने के छह घंटे के अंदर। इसके अलावा फ्रेमवर्क में बैंकों को अपने सुरक्षा सिस्टम के उल्लंघन का विश्लेषण करने और इन्हें रोकने के लिए प्रणाली लाने को कहा गया था।