कांग्रेस को मिली ऑक्सीजन
कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक यह इसलिए मुमकिन हो सका क्योंकि पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथों में है, अगर राहुल गांधी के हाथ में होती तो उनकी नई नवेली कोटरी अशोक तंवर को बदलने की बजाय हुड्डा और शैलजा को ही किनारे लगाती भले ही विधानसभा चुनाव में पार्टी दहाई से इकाई सीटों पर निबट जाती। लेकिन अब बदले समीकरण से कांग्रेस को आक्सीजन मिल गई है और अगर पार्टी ने अपने पत्ते ठीक से चले तो मुकाबला भी भाजपा और कांग्रेस के ही बीच सीधा होगा।
हुड्डा और शैलजा की नियुक्तियों से हरियाणा की राजनीति में कांग्रेस जाटों और दलितों का मजबूत गठबंधन बनाने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा को कांग्रेस और इनेलो के दोनों धड़ों के बीच जाट वोटों के बंटवारे और अपने साथ गैर जाट वोटों के ध्रुवीकरण, मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की ईमानदार साफ सुथरी छवि, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने से पैदा हुई राष्ट्रवादी भावना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करिश्माई छवि के बल पर दूसरी बार अपनी सरकार बनाने का पूरा भरोसा है। बताया जाता है कि हरियाणा कांग्रेस में सियासी वर्चस्व को लेकर चलने वाली लड़ाई में कांग्रेस मीडिया विभाग के संयोजक रणदीप सुरजेवाला भी एक ध्रुव हैं।
सुरजेवाला का बढ़ता गया कद
रणदीप के पिता शमशेर सिंह सुरजेवाला कभी हरियाणा में कांग्रेस के दिग्गज नेता हुआ करते थे और लंबे समय तक वह कांग्रेस की किसान सेल के अध्यक्ष भी रहे। लेकिन भजनलाल के बाद जिस तरह भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कद बढ़ा और शमशेर सिंह सुरजेवाला की उम्र बढ़ी उससे वह पीछे छूट गए। रणदीप सुरजेवाला ने बतौर युवक कांग्रेस अध्यक्ष कांग्रेस की युवा राजनीति में अपने आक्रामक तेवरों से और इनेलो अध्यक्ष ओम प्रकाश चौटाला के खिलाफ चुनाव लड़कर अपनी जुझारू छवि बनाई और जैसे जैसे कांग्रेस में राहुल गांधी की भूमिका बढ़ी रणदीप सुरजेवाला का कद भी बढ़ा और जल्दी ही वह कांग्रेस की आवाज बन गए।
राहुल से निकटता और अपने बढ़े हुए कद के बाद रणदीप को हरियाणा में हुड्डा के विकल्प के तौर पर भी देखा जाने लगा। राहुल की टीम के नए रणनीतिकारों ने हरियाणा की राजनीति में हुड्डा परिवार के वर्चस्व को तोड़ने के लिए ही युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे अशोक तंवर को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनवाया। कहा जाता है कि तंवर को रणदीप सुरजेवाला का आशीर्वाद और संरक्षण मिलता रहा। लेकिन तंवर अपेक्षित नतीजे नहीं दे पाए और खुद रणदीप भी जींद उपचुनाव में बुरी तरह हार गए। इससे हुड्डा ने हाईकमान पर अपना दबाव बढ़ा दिया।
हुड्डा से हुई सोनिया की लंबी बातचीत
लेकिन लोकसभा चुनावों में सोनीपत से भूपेंद्र सिंह हुड्डा और रोहतक से उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा की हार ने उनकी आवाज को भी कमजोर किया। इधर कांग्रेस में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद तीन महीने तक नए अध्यक्ष को लेकर रस्साकसी चलती रही। आखिर जब सोनिया गांधी ने फिर से कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाला तो उन्होंने लगातार हरियाणा में सभाएं कर रहे हुड्डा को बुलाकर लंबी बातचीत की और फिर शैलजा और हुड्डा के बीच आपसी समझदारी बनी, जिसके बाद शैलजा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कांग्रेस विधायक दल का नेता और प्रदेश चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाया गया।
शैलजा को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने दलितों की नाराजगी से भी खुद को बचा लिया। क्योंकि अगर दलित अशोक तंवर को हटाकर हुड्डा या किसी और गैरदलित को प्रदेश पार्टी की कमान दी जाती तो उस पर दलित विरोधी होने का आरोप लगता और बसपा इसे विधानसभा चुनाव में मुद्दे के रूप में उछालती, जिसका नुकसान हो सकता था।
लेकिन शैलजा न सिर्फ दलित हैं बल्कि महिला भी हैं और उनके पिता भी हरियाणा कांग्रेस के कद्दावर दलित नेता रहे हैं। इसलिए अंबाला से लेकर सिरसा तक के इलाके में शैलजा का आधार है और प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पूरे हरियाणा में दलितों में शैलजा के जरिए कांग्रेस अपनी पैठ बनाने की कोशिश करेगी जबकि रोहतक सोनीपत हिसार की जाट पट्टी से लेकर पूरे हरियाणा में जाटों के बीच हुड्डा कांग्रेस के खेवनहार बनेंगे।