सोनिया गांधी की आत्मकथा पर विवाद।
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सोनिया गांधी की आत्मकथा बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव के छपने से पहले ही इस पर विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि हाल ही में इस किताब के प्रकाशन के अधिकार हासिल करने वाली कंपनी पेंग्विन रैंडम हाउस की भारतीय इकाई ने कहा कि वह इसे भारत में प्रकाशित नहीं करेगी। चौंकाने वाली बात यह है कि 18 अगस्त को ही पेंग्विन की ही अमेरिकी सहयोगी कंपनी आल्फ्रेड ए. नॉफ इस किताब को 10 नवंबर को लॉन्च करने की बात कही। ऐसे में जहां पूरी दुनिया में किताब का घोषित तारीख पर प्रकाशित होना तय है, वहीं भारत में इसके प्रकाशित होने पर अब संशय की स्थिति है। इस मुद्दे पर कांग्रेस पेंग्विन इंडिया और केंद्र सरकार पर हमलावर है।
आज सोनिया गांधी की इसी किताब, इसमें छिपे राज और किताब के छपने से पहले ही इस पर मचे बवाल पर अमर उजाला के स्टूडियो में चर्चा हुई। चर्चा के लिए मौजूद रहे वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, जिन्होंने इस पूरे विषय पर गहराई से चर्चा की।
सोनिया गांधी की किताब के संदर्भ में विवाद क्या है?
विनोद अग्निहोत्री के मुताबिक, सोनिया गांधी की जल्द ही प्रकाशित होने वाली किताब को लेकर मुख्य विवाद यह है कि इसके प्रकाशक (पब्लिशर) की भारतीय शाखा 'फैक्ट चेक' के बहाने किताब के कुछ प्रसंगों को हटाने या संपादित (कांटछांट) करने के लिए कह रही है। हालांकि, सोनिया गांधी ने इस तरह की किसी भी कांटछांट को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया है।
इस विवाद में एक बड़ा विरोधाभास यह है कि इसी प्रकाशक संस्थान की अंतरराष्ट्रीय (अमेरिकी) शाखा इस किताब को बिना किसी बदलाव के आगामी नवंबर में रिलीज करने की तैयारी में है। प्रकाशक के इस रवैये के कारण कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी को यह आरोप लगाने का मौका मिल गया है कि भारतीय शाखा पर सरकार या किसी अन्य बाहरी तत्व का दबाव है। हाल ही में इसी पब्लिशर ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की किताब को भी प्रकाशित करने से मना कर दिया था, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ था।
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क्या पहले भी इस तरह के किताब पर विवाद हुए और कब?
वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि भारतीय राजनीतिक इतिहास में ऐसी कई किताबें रही हैं जिन्होंने पहले भी भारी राजनीतिक उथल-पुथल मचाई है।
1. जसवंत सिंह की किताब (जिन्ना पर)
वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक, भाजपा नेता जसवंत सिंह ने मोहम्मद अली जिन्ना पर एक किताब लिखी थी, जिसमें उन्होंने जिन्ना की तारीफ की थी। शिमला में चल रही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान ही इस किताब को लेकर इतना बवाल मचा कि जसवंत सिंह को तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। अग्निहोत्री ने यह भी याद दिलाया कि जसवंत सिंह से पहले खुद लालकृष्ण आडवाणी को भी जिन्ना पर दिए गए एक भाषण के कारण खामियाजा भुगतना पड़ा था और उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ा था।
2. लालकृष्ण आडवाणी की माय कंट्री माय लाइफ
विनोद अग्निहोत्री ने बताया कि भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा में साल 1999 के आईसी-814 कांधार विमान अपहरण कांड का प्रसंग लिखा था। उन्होंने अपनी किताब में दावा किया था कि जब आतंकवादियों को रिहा किया गया और तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह उन्हें लेकर काबुल गए, तब उन्हें (आडवाणी को) इसकी जानकारी नहीं थी या उन्हें इस फैसले में विश्वास में नहीं लिया गया था। वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि आडवाणी का यह दावा लोगों के गले नहीं उतरा। उस समय वे देश के गृह मंत्री, उप-प्रधानमंत्री और सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (सीसीएस) के सदस्य थे। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद सरकार में वही सब कुछ संभाल रहे थे, इसलिए इतने बड़े फैसले में उनकी सहमति न होने की बात पर भारी विवाद और असहमति खड़ी हो गई।
3. नटवर सिंह की वन लाइफ इज नॉट इनफ
नटवर सिंह की इस किताब को लेकर देश की राजनीति में भारी बवाल मचा था। उन्होंने अपनी पुस्तक में सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद को ठुकराने के ऐतिहासिक फैसले पर कई तीखी और आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं। विनोद अग्निहोत्री ने बताया कि नटवर सिंह ने यह किताब तब लिखी जब वे वोल्कर कमीशन विवाद में फंसने के बाद मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे, कांग्रेस पार्टी से बाहर हो चुके थे और उनका टिकट भी कट चुका था। इस कारण से वे गंभीर नाराजगी और 'खुंदक' में थे, जिसके बाद उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और यह किताब लिखी। अग्निहोत्री के अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत नाराजगी या पद खोने के गुस्से में लिखता है, तो भले ही उसकी बातें सच क्यों न हों, लेकिन उसकी गरिमा और विश्वसनीयता कम हो जाती है। लोग उसे केवल एक 'नाराज नेता की भड़ास' के रूप में देखते हैं।
4. द सैटेनिक वर्सेज सलमान रश्दी (1988)
इस किताब में पैगंबर को लेकर की गई टिप्पणियों के कारण दुनिया भर में उग्र प्रदर्शन हुए। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने भारत में इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया था और इस पर आज भी पाबंदी लगी हुई है। इस किताब के कारण रश्दी को दशकों तक कड़ी सुरक्षा में रहना पड़ा और उन पर जानलेवा हमला भी हुआ था। इससे पहले रश्दी की 1981 की किताब मिडनाइट्स चिल्ड्रन्स पर भी इंदिरा गांधी और संजय गांधी से जुड़े आरोपों को लेकर विवाद हुआ था, लेकिन सोशल मीडिया न होने के कारण यह अखबारों तक ही सीमित रहा।
5. संजय बारू की द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर
उन्होंने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी इस किताब में लिखा था कि सोनिया गांधी वर्ष 2012 के आसपास राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थीं। इस किताब को लेकर भी तीखा विवाद हुआ और बाद में इस पर एक फिल्म भी बनी।
इसी तरह उन्होंने पीएन मथाई की किताब का जिक्र कर बताया कि उनकी किताब में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को लेकर कई ऐसे व्यक्तिगत दावे किए गए थे जिनकी पुष्टि नहीं की जा सकती थी। विवाद बढ़ने के बाद इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया गया था। वहीं, जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक ने अपनी किताब में दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु को हत्या बताते हुए उस पर संदेह व्यक्त किया था और अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर कई दावे किए थे। यह किताब बैन तो नहीं हुई, लेकिन इसे बाजार से पूरी तरह गायब कर दिया गया।
उन्होंने बताया कि तस्लीमा नसरीन की संवेदनशील किताब को लेकर, निर्जा चौधरी की प्रधानमंत्रियों के फैसलों पर आधारित पुस्तक, कुलदीप नैयर की इमरजेंसी पर लिखी द जजमेंट और धनान ठाकुर की ऑल द प्राइम मिनिस्टर्स मैन जैसी किताबों ने भी अपने दौर में काफी सुर्खियां और विवाद बटोरे हैं।
क्यों खड़े हो जाते हैं किताबों पर विवाद, ये कितने सही?
विनोद अग्निहोत्री ने बताया कि कई बार इन किताबों को लेकर गैर-जरूरी विवाद हो जाता है। उन्होंने कहा, "मान लीजिए मैंने कोई किताब लिखी। अगर मेरी कोई समझ है किसी संस्था या किसी पार्टी को लेकर, अगर मैं उसमें भाषा और संयम की मर्यादा बनाकर वैचारिक समझ को लिखता हूं तो दूसरा पक्ष उस पर सड़क पर उतर कर विरोध क्यों करेगा। आप वैचारिक रूप से ही जवाब दें। आलोचना लिखकर या लेख लिखकर। अगर किसी की कोई समझ है और वह तर्कपूर्ण लिख रहा है तो उसका जवाब भी तर्क से दिया जाना चाहिए।"
उन्होंने चुटकी लेते हुए यह भी जोड़ा कि फिल्मों और किताबों के साथ यह विडंबना जुड़ी हुई है कि जैसे ही उनके खिलाफ कोई विरोध प्रदर्शन या विवाद खड़ा होता है, वैसे ही बाजार में उनकी मांग और लोकप्रियता कई गुना बढ़ जाती है।