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मायावती-सोनिया की खिचड़ी ने चढ़ाया राजनीति का पारा

Sun, 03 Jun 2018 05:33 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण में बसपा सुप्रीमो मायावती का यूपीए चेयरपर्सन सोनिया के पास जाना, उनसे गबहियां करना और कंधे पर सिर रख देना। बात यहीं खत्म नहीं हुई। सोनिया गांधी ने मायावती के माथे पर अपना सिर टिका दिया। यह फोटो जितनी वायरल हुई है, उतनी ही इसे लेकर राजनीतिक हलचल है। भाजपा के एक महासचिव को इसमें 2019 की राजनीति दिखाई दे रही है। जबकि बसपा और कांग्रेस के नेता कुछ नहीं बोलना चाहते। अंदर ही अंदर खिचड़ी पक रही है।

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मायावती के लखनऊ स्थित आवास के सूत्र कहते हैं कि गोरखपुर, फूलपुर, कैराना का लोकसभा चुनाव कुछ संकेत दे रहा है। मायावती के काफी करीबी सूत्र के अनुसार फिलहाल विपक्ष के बीच में कोई मतभेद देखने में नहीं आ रहा है। वहीं राज्यसभा से सांसद रहे और मायावती का विश्वास एक अन्य सूत्र के अनुसार बेंगलूरू में काफी कुछ देश ने देख लिया है। अब तो जो होगा वह समय बताएगा।

बसपा में कोई बोलता नहीं
 
बसपा में मायावती और सतीश चंद्र मिश्रा के अलावा कोई नहीं बोलता। लेकिन माना जा रहा है कि बसपा और कांग्रेस की नजदीकियां काफी बढ़ रही हैं। यूपी का विधानसभा चुनाव कांग्रेस सपा की बसपा के साथ लड़ना चाहती थी, लेकिन तब बात नहीं बन पाई। 
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यूपी के प्रभारी और कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद मायावती के पास गए थे और उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा था। लेकिन कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद अब कांग्रेस में उम्मीद के अंकुर फूटने लगे हैं। कांग्रेस पार्टी की निगाह फिलहाल राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पर टिकी है। पार्टी के रणनीतिकारों को सबसे आसान जीत राजस्थान में दिखाई पड़ रही हैं।

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राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़

तीनों राज्यों में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है। तीनों ही राज्यों में (राजस्थान 17.83 में मध्यप्रदेश में 15.6 और छत्तीसगढ़ में 11.6 प्रतिशत) दलितों की आबादी निर्णायक है। राजस्थान में और म.प्र. में बसपा के विधायक चुनाव जीतते हैं। म.प्र. में बसपा सात प्रतिशत के करीब वोट पा जाती है।

कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों के अनुसार राजस्थान में उनकी जीत आसानी से संभव है। इसका एक कारण वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ बढ़ रही सरकार विरोधी लहर और वहां के मतदाताओं का रुझान है। 

मतदाता पांच साल बाद सत्ता में बदलाव का रुझान दिखाते हैं। इसके बाद बारी म.प्र. की आती है। म.प्र. में शिवराज सिंह चौहान कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की फौज होने के बाद भी सत्ता में बने हुए हैं। लेकिन इस बार कांग्रेस ने वहां करो या मरो की तर्ज पर राजनीति अभियान तेज किया है।

दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच में समीकरण बिठाया है। कांग्रेस पार्टी को म.प्र. में 36 प्रतिशत के करीब मत मिल जाते हैं। इस बार उसे उम्मीद है कि व्यापमं, किसान आंदोलन, दिग्विजय सिंह नर्मदा यात्रा, कमलनाथ का चेहरा, ज्योतिरादित्य के प्रयास से मतों का प्रतिशत बढ़ेगा। 

स्वाभाविक है कि मोदी सरकार के कामकाज से बढ़ रही नाराजगी, शिवराज सरकार के खिलाफ सरकार विरोधी लहर का भी फायदा मिलेगा। इसके बाद भी पार्टी के रणनीतिकार बसपा के साथ गठबंधन या सीटों की साझेदारी या आपसी तालमेल के पक्ष में हैं।

बसपा को सम्मानजनक सीटें देने में भी परहेज नहीं है। कुल मिलाकर कांग्रेस दिग्विजय सिंह के दूसरे कार्यकाल के लिए हुए विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के संस्थापक कांशीराम और कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह के बीच बनी सहमति जैसा प्रयास चाहती है। ताकि म.प्र. से शिवराज सिंह चौहान की सरकार को सत्ता से बेदखल किया जा सके।

इसी तरह से बसपा के साथ आने के बाद छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की मुश्किल काफी कम हो जाएगी। माना जा रहा है कि मायावती को इसमें कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन अभी इस बारे में वह सोनिया गांधी की तरफ से मिलने वाले किसी संदेश का इंतजार कर रही हैं।
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भाजपा की भी है निगाह

कांग्रेस और बसपा के बीच बढ़ रहे तालमेल पर भाजपा की भी निगाह है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि सभी विरोधी दलों के एकजुट होने से चुनौती तो बढ़ेगी, लेकिन सभी दल मिलकर भी भाजपा को नहीं हरा सकते।

2019 में केन्द्र में भाजपा की ही सरकार बनेगी और भाजपा आगे होने वाले विधानसभा चुनावों में अच्छी जीत दर्ज करेगी। यह पूछने पर कि सपा और कांग्रेस का तालमेल चुनौती बढ़ाएगा या फिर बसपा और कांग्रेस का तो सूत्र का कहना है कि समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के तालमेल का हश्र उ.प्र. विधानसभा चुनाव में देखा जा चुका है।

जुलाई-अगस्त में साफ होगी तस्वीर

विरोधी दलों की एकजुटता पर अभी कोई दल कुछ खुलकर नहीं बोल रहा है। उ.प्र. के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, रालोद प्रमुख चौधरी अजीत सिंह, कांग्रेस पार्टी के नुलाम नबी आजाद समेत सब विरोधी दलों की एकजुटता के प्रति आश्वस्त हैं। लोकतांत्रिक जनता दल के संरक्षक शरद यादव का कहना है कि अब एक जुट नहीं होंगे तो आखिर कब होंगे?

माना जा रहा है कि इसको लेकर जुलाई-अगस्त तक तस्वीर साफ होने लगेगी। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि एकजुटता में कोई कठिनाई नहीं आएगी। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि 2004 में यूपीए सरकार सत्ता में आई थी। हमने तालमेल के साथ सरकार चलाई है। सूत्र का कहना है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करके और आपसी तालमेल के जरिए सब एकजुट हो सकते हैं।
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