केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शुक्रवार को कहा था कि भारत में किसी अध्ययन ने यह दावा नहीं किया है कि प्रदूषण से जीवन प्रत्याशा घटती है। ऐसे में इसको लेकर जनता के बीच किसी तरह का मनोवैज्ञानिक डर पैदा करने की जरूरत नहीं है।
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, 2019 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अभी भी 60 फीसदी लोग ठोस ईंधन से खाना बनाते हैं। इसकी वजह से घर के भीतर प्रदूषण बढ़ रहा है। भारत में साल 2017 में करीब 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई है। यह जानकारी वायु प्रदूषण पर आई एक वैश्विक रिपोर्ट में दी गई है।
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, 2019 रिपोर्ट में कहा गया है कि ये मौतें सीधे तौर पर पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 से जुड़ीं हैं। इसमें बताया गया है कि भारत में स्वास्थ्य संबंधी खतरों से होने वाली मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण और इसके बाद धूम्रपान है।
साल 2017 में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत सहित दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण से एक साल से कम उम्र के 1.22 करोड़ शिशुओं के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनिसेफ ने कहा था कि वायु प्रदूषण के संकट से लाखों भारतीय बच्चे प्रभावित हो रहे हैं।
वहीं अमेरिका की शोध संस्था ‘ईपिक’ (एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो) ने एक रिपोर्ट में कहा था कि, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 2016 में वायु प्रदूषण ने जीवन प्रत्याशा को 10 साल कम कर दिया है। अध्ययन में कहा गया था कि पिछले दो दशकों में पूरे भारत में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम ) 2.5 में 69 फीसदी की वृद्धि हुई है। जिससे 1998 की तुलना में जीवन प्रत्याशा घटने की दर में 2.1 साल कम हो गई है।
पिछले महीने अमेरिका की शोध संस्था ‘ईपिक’ (एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो) द्वारा तैयार ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ के विश्लेषण के मुताबिक उत्तराखंड में हो रहा वायु प्रदूषण यहां लोगों की उम्र औसतन 4.2 साल तक कम कर रहा है।
इस शोध में पता चला है कि उत्तराखंड में हो रहा वायु प्रदूषण यहां लोगों की उम्र औसतन 4.2 साल तक कम कर रहा है। लेकिन अगर यहां के वायुमंडल में प्रदूषित सूक्ष्मतत्वों एवं धूलकणों की सघनता 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बताया गया सुरिक्षत मानक) के सापेक्ष हो तो राज्य के लोगों की उम्र बढ़ सकती है।
पीछले महीने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के दौरान गंगाराम अस्पताल के श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुप बासु ने भी कहा था कि दिल्ली में सांस के पुराने मरीजों की बीमारियां बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण बढ़ने पर पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) 2.5 व पीएम-10 जैसे सूक्ष्म कण सांस के जरिये शरीर में प्रवेश करते हैं। इस वजह से फेफड़े में संक्रमण होने के कारण अस्थमा व ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियां होती हैं। पीएम-2.5 फफड़े से ब्लड में पहुंच जाता है। उन्होंने कहा कि ओपीडी में सांस के मरीजों की संख्या में 35-40 फीसद बढ़ोतरी हुई है।