फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्रदूषण को लेकर प्रकाश जावड़ेकर के दावों को झुठलाती भारतीय अध्यन की यह रिपोर्ट

Sat, 07 Dec 2019 08:59 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
प्रकाश जावड़ेकर (फाइल फोटो)
विज्ञापन

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शुक्रवार को कहा था कि भारत में किसी अध्ययन ने यह दावा नहीं किया है कि प्रदूषण से जीवन प्रत्याशा घटती है। ऐसे में इसको लेकर जनता के बीच किसी तरह का मनोवैज्ञानिक डर पैदा करने की जरूरत नहीं है।

विज्ञापन


लोकसभा में प्रदूषण से जीवन प्रत्याशा घटने के दावों से जुड़े सवाल पर बोलते हुए जावड़ेकर ने कहा था, सरकार प्रदूषण को कम करने की दिशा में जरूरी कदम उठा रही है और इनका असर भी दिख रहा है। उन्होंने सदन को बताया कि भारतीय अध्ययनों में प्रदूषण और जीवन प्रत्याशा के बीच किसी तरह के संबंध का जिक्र नहीं है।

वहीं कुछ रिसर्च रिपोर्ट हैं जो केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के दावों को झूठा साबित करते हैं। 

वायु प्रदूषण की वजह से होने वाली घातक बीमारियों की वजह से भारत में औसत आयु 2.6 साल कम हो गई है। बाहरी पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5, ओजोन और घर के अंदर के वायु प्रदूषण के सामूहिक प्रभाव की वजह से भारतीयों समेत दक्षिण एशियाई लोगों की जीवन प्रत्याशा 2.6 वर्ष कम हो गई है। 
विज्ञापन


घर से बाहर का वायु प्रदूषण आपकी उम्र डेढ़ साल तक कम कर देता है, जबकि घर के अंदर का वायु प्रदूषण आपकी उम्र एक साल दो महीने तक घटा देता है। यह जानकारी सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायर्मेंट ने अपने शोध के आधार पर जून 2019 में दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वायु प्रदूषण से हर साल पांच साल से कम उम्र के एक लाख बच्चों की मौत हो जाती है।

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, 2019 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अभी भी 60 फीसदी लोग ठोस ईंधन से खाना बनाते हैं। इसकी वजह से घर के भीतर प्रदूषण बढ़ रहा है। भारत में साल 2017 में करीब 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई है। यह जानकारी वायु प्रदूषण पर आई एक वैश्विक रिपोर्ट में दी गई है।

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, 2019 रिपोर्ट में कहा गया है कि ये मौतें सीधे तौर पर पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 से जुड़ीं हैं। इसमें बताया गया है कि भारत में स्वास्थ्य संबंधी खतरों से होने वाली मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण और इसके बाद धूम्रपान है।

साल 2017 में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत सहित दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण से एक साल से कम उम्र के 1.22 करोड़ शिशुओं के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनिसेफ ने कहा था कि वायु प्रदूषण के संकट से लाखों भारतीय बच्चे प्रभावित हो रहे हैं।

वहीं अमेरिका की शोध संस्था ‘ईपिक’ (एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो) ने एक रिपोर्ट में कहा था कि, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 2016 में वायु प्रदूषण ने जीवन प्रत्याशा को 10 साल कम कर दिया है। अध्ययन में कहा गया था कि पिछले दो दशकों में पूरे भारत में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम ) 2.5 में 69 फीसदी की वृद्धि हुई है। जिससे 1998 की तुलना में जीवन प्रत्याशा घटने की दर में 2.1 साल कम हो गई है।  

पिछले महीने अमेरिका की शोध संस्था ‘ईपिक’ (एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो) द्वारा तैयार ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ के विश्लेषण के मुताबिक उत्तराखंड में हो रहा वायु प्रदूषण यहां लोगों की उम्र औसतन 4.2 साल तक कम कर रहा है।  
 
इस शोध में पता चला है कि उत्तराखंड में हो रहा वायु प्रदूषण यहां लोगों की उम्र औसतन 4.2 साल तक कम कर रहा है। लेकिन अगर यहां के वायुमंडल में प्रदूषित सूक्ष्मतत्वों एवं धूलकणों की सघनता 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बताया गया सुरिक्षत मानक) के सापेक्ष हो तो राज्य के लोगों की उम्र बढ़ सकती है। 

पीछले महीने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के दौरान गंगाराम अस्पताल के श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुप बासु ने भी कहा था कि दिल्ली में सांस के पुराने मरीजों की बीमारियां बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण बढ़ने पर पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) 2.5 व पीएम-10 जैसे सूक्ष्म कण सांस के जरिये शरीर में प्रवेश करते हैं। इस वजह से फेफड़े में संक्रमण होने के कारण अस्थमा व ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियां होती हैं। पीएम-2.5 फफड़े से ब्लड में पहुंच जाता है। उन्होंने कहा कि ओपीडी में सांस के मरीजों की संख्या में 35-40 फीसद बढ़ोतरी हुई है। 

 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें