भारतीय समयानुसार ग्रहण सुबह 5 बजकर 04 मिनट पर शुरू होगा और सुबह 9 बजकर 18 मिनट पर खत्म हो जाएगा। लेकिन यह भारत में दिखाई नहीं देगा। यह चीन की राजधानी बीजिंग में दिखाई देगा और सूर्य का 20 फीसदी हिस्सा, जापान की राजधानी टोक्यो में 30 फीसदी और रूस के व्लादिवोस्टक में 37 फीसदी ग्रहण दिखाई देगा।
भारत में कब दिखेंगे
भारत वासियों को इस बार सूर्य ग्रहण देखने के लिए साल के अंत तक का इंतजार करना पड़ेगा। 26 दिसंबर को भारत में आंशिक सूर्य ग्रहण देखने को मिलेगा। यह सूर्य ग्रहण 2 घंटे, 40 मिनट और 6 सेकंड तक चलेगा। इस ग्रहण की शुरुआत सुबह 8.17 बजे होगी और 10.57 बजे सूर्य ग्रहण खत्म होगा। ग्रहण सुबह 9.30 बजे अपने चरम पर होगा। यह साल का तीसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण होगा। दक्षिण भारत में रहने वाले इसे ज्यादा स्पष्ट देख पाएंगे। खासतौर पर कन्नूर, कोझीकोड, मदुरै और त्रिशूर क्षेत्र में ये साफ नजर आएगा।
चंद्र ग्रहण 16-17 जुलाई को
इसके अलावा सालभर में कई चंद्रग्रहण भी देखने को मिलेंगे। साल के पहले महीने में यानी 20-21 जनवरी को पूर्ण चंद्र ग्रहण देखने को मिलेगा। यह ग्रहण भी भारत में नहीं देखा जा सकेगा। हमारे देश में चंद्रग्रहण देखने के लिए 16-17 जुलाई तक इंतजार करना पड़ेगा।
ग्रहण को लेकर कई मिथक हैं लेकिन इसके कई वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। सूर्यग्रहण के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अवधि के दौरान पृथ्वी के उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव प्रभावित होते हैं। यह अवधि ऋणात्मक मानी जाती है। ग्रहण के दौरान सूर्य से निगेटिव विकीरण यानी रेडिएशंस निकलती हैं। इसलिए नंगी आंखों से देखने के लिए मना किया जाता है ।
क्या हैं ग्रहण से जुड़े मिथक
भारत में तो ग्रहण को लेकर काफी मिथक भी जुड़े हैं। ज्योतिष और पंडितों के अनुसार जहां ग्रहण शुरू होने के पहले ही मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं वहीं गर्भवति महिलाओं और बच्चों को भी इसके सीधे संपर्क में आने की मनाही होती है। कुछ ऐसा ही हाल विदेशों का भी है।
कैलिफोर्निया की ग्रिफिथ वैधशाला के शोध के अनुसार 17वीं सदी के अंतिम वर्षों तक भी अधिकांश लोगों को मालूम नहीं था कि ग्रहण क्यों होता है या तारे क्यों टूटते हैं। हालांकि आठवीं शताब्दी से ही खगोलशास्त्रियों को इनके वैज्ञानिक कारणों की जानकारी थी। क्रप के मुताबिक जानकारी के इस अभाव की वजह थी उस दौर में संचार और शिक्षा की कमी। जानकारी का प्रचार-प्रसार मुश्किल था, जिसके कारण अंधविश्वास पनपते रहे। शोध यह कहता है कि प्राचीन समय में मनुष्य की दिनचर्या कुदरत के नियमों के हिसाब से संचालित होती थी।
मान्यताएं जो डराती हैं, शोध जो जागरूक करते हैं
चांद और सूर्य यानी प्रकाश के स्रोत पर किसी भी तरह का प्रभाव लोगों को डराता है। इसीलिए इससे जुड़ी कई तरह की कहानियां भी प्रचलित हैं। पश्चिमी एशिया में मान्यता है कि ग्रहण के दौरान ड्रैगन सूरज को निगलने की कोशिश करता है। इसलिए वहां उस ड्रैगन को भगाने के लिए ढोल-नगाड़े बजाए जाते थे। वहीं, चीन में मान्यता थी कि सूरज को निगलने की कोशिश करने वाला दरअसल स्वर्ग का एक कुत्ता है। पेरुवासियों के मुताबिक यह एक विशाल प्यूमा था और वाइकिंग मान्यता थी कि ग्रहण के समय आसमानी भेड़ियों का जोड़ा सूरज पर हमला करता है।
चूंकि ग्रहण एक खगोलीय घटना है इसलिए शुरू से ही पढ़ाया जाता रहा है कि जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं तो ग्रहण लगता है। जब सूर्य और पृथ्वी के बीच जैसे ही चंद्रमा आता है तब इस घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। दरअसल सूर्य ग्रहण भी तीन तरह का होता है। पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण और वलयाकार सूर्य ग्रहण कहा जाता है । यह घटना हमेशा अमावस्या के दिन ही होती है।
1. पूर्ण सूर्यग्रहण
पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाता है और इसका प्रकाश पूरी तरह से धरती पर नहीं पहुंच पाता है और पृथ्वी पर अंधकार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार बनने वाला ग्रहण पूर्ण सूर्य ग्रहण कहलाता है।
2. आंशिक
आंशिक सूर्यग्रहण की बात की जाए, तो इसमें चंद्रमा, सूर्य के केवल कुछ भाग को ही अपनी छाया में ले पाता है। इससे सूर्य का कुछ भाग ग्रहण ग्रास में तथा कुछ भाग ग्रहण से अप्रभावित रहता है। इस प्रक्रिया को आंशिक सूर्यग्रहण की संज्ञा दी जाती है।
3. वलय
अंतिम प्रकार का सूर्य ग्रहण "वलय सूर्यग्रहण" के नाम से जाना जाता है। इसमें चंद्रमा सूर्य को इस प्रकार से ढकता है कि सूर्य का केवल मध्य भाग ही छाया क्षेत्र में आता है। सूर्य के बाहर का क्षेत्र प्रकाशित होने के कारण कंगन के समान प्रतीत होता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार पूर्ण-ग्रहण के समय चंद्रमा को सूरज के सामने से गुजरने में दो घंटे लगते हैं। इस दौरान सूर्यग्रहण के दौरान चंद्रमा की गति सवा दो हजार किलोमीटर प्रतिघंटा होती है। यानी इस गति से वह सूर्य के सामने से गुजरता है। 1968 में लार्कयर नामक वैज्ञानिक ने सूर्य ग्रहण के अवसर पर की गई खोज के सहारे वर्ण मंडल में हीलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था। संपूर्ण सूर्यग्रहण की वास्तविक अवधि अधिक से अधिक 11 मिनट ही हो सकती है उससे अधिक नहीं।
ये परिस्थितियां जरूरी
परंपरा के अनुसार आज भी सूर्य ग्रहण के लिए कुछ खास स्थितियों का होना अत्यंत जरूरी होता है। जैसे-उस दिन पूर्णिमा या अमावस्या ही होनी चाहिए। चंद्रमा का रेखांश राहू या केतु के पास होना चाहिए। चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिए।
ये हैं खास बातें
- सूर्यग्रहण के वक्त पृथ्वी के ध्रुवों पर चंद्रमा की परछाईं 5000 मील प्रति घंटा की रफ्तार से चलती है।
- सूर्यग्रहण के वक्त पृथ्वी पर चंद्रमा की परछाईं पड़ती है, जो 1100 मील प्रति घंटा की रफ्तार से इक्वेटर पर चलती है।
- पृथ्वी पर पड़ने वाली परछाईं की अधिकतम चौड़ाई 167 मील हो सकती है, इससे अधिक नहीं हो सकती।
- उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव से केवल आंशिक सूर्य ग्रहण ही दिख सकता है, पूर्ण सूर्य ग्रहण यहां से कभी नहीं दिख सकता है।
- जब सूर्य ग्रहण चरम पर होता है, तब पृथ्वी पर चंद्रमा की एक गोलाकार छवि बनती है।
- पूर्ण सूर्यग्रहण 18 माह में एक बार ही दिखाई देता है।