नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मुताबिक, एक लंबी खोज के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने नॉन इनवेसिव हीमोग्लोबिन स्क्रीनिंग डिवाइस तैयार की है। किसी भी व्यक्ति में हीमोग्लोबिन का स्तर पता लगाने के लिए इस उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए मरीज से रक्त नमूना लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। आईसीएमआर के अनुसार, जब भी एनीमिया की जांच की जाती है तो व्यक्ति से सीरिंज के जरिये रक्त निकाला जाता है। करीब तीन से 10 एमएल तक रक्त लेकर प्रयोगशाला में जांच करते हैं और फिर बचा हुआ रक्त चिकित्सकीय अपशिष्ट में फेंक दिया जाता है। इस प्रक्रिया में समय, रक्त और बजट तीनों काफी खर्च होते हैं।
महिलाएं ज्यादा प्रभावित
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 (2019-21) के अनुसार, एनीमिया की व्यापकता पुरुषों (15-49 वर्ष) में 25.0 फीसदी और महिलाओं (15-49 वर्ष) में 57.0 फीसदी है। वहीं, किशोर (15-19 वर्ष) में यह 31.1 फीसदी और किशोरियों में 59.1 फीसदी है। इनके अलावा 15 से 49 वर्ष तक की 52.2 फीसदी गर्भवती महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर कम है, जिन्हें एनीमिया ग्रस्त माना जा सकता है। इसी तरह छह से 59 माह तक के करीब 67.1 फीसदी बच्चे एनीमिया की चपेट में हैं।
46 टन कार्बन का उत्सर्जन भी नहीं हुआ
आईसीएमआर के मुताबिक, नॉन इनवेसिव हीमोग्लोबिन स्क्रीनिंग डिवाइस को जमीनी स्तर पर ले जाने के लिए बॉश और इजेआरएक्स कंपनी के साथ समझौता हुआ है। इन्होंने अब तक 24 लाख से ज्यादा लोगों में एनीमिया की जांच की है, जिसके जरिये 6,075 यूनिट रक्त की बचत हुई है। कुल 24,49,210 में 16.28 लाख महिला और 8.20 लाख पुरुष शामिल हैं। इस प्रक्रिया के जरिये करीब 46 टन कार्बन उत्सर्जन भी कम होने का दावा किया है।