एक्सप्लेनर: एसआईआर में अब तक कटे कितने नाम, सबसे ज्यादा किस राज्य में कम हुए मतदाता, बाकियों के आंकड़े क्या?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 24 Sep 2026 09:53 AM IST
सार
चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से अब तक 11.8 करोड़ नाम कटे। दिल्ली, महाराष्ट्र और यूपी में सबसे ज्यादा असर। जानिए राज्यवार आंकड़े, ड्राफ्ट रोल और पूरा विवाद।
भारत के अलग-अलग राज्यों में एक साल से ज्यादा समय से जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विपक्ष सरकार को घेरता रहा है। एसआईआर की समयसीमा और इसके तरीके को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। कई राजनीतिक दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग मनमाने ढंग से नाम काट रहा है और बड़े स्तर पर वैध वोटरों के दस्तावेजों की कमी बताकर उनसे मतदान का सांविधानिक अधिकार छीन रहा है।
अब एक अखबार में छपी रिपोर्ट के बाद से चुनाव आयोग की एसआईआर में भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एसआईआर शुरू होने के बाद से ही दो चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और इसके बदलते नियमों पर सवाल उठाए हैं। दावा है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की ओर से इससे जुड़े मुद्दों को 10 महीने में 14 बार उठाया गया। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद से ही विपक्ष ने अब पूरी एसआईआर की प्रक्रिया को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है और आरोप लगाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त, दो आयुक्तों वाले चुनाव आयोग में एसआईआर से जुड़े कई फैसलों पर सहमति नहीं थी। इन दलों ने एसआईआर की प्रक्रिया को गड़बड़ बताया है।
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एसआईआर प्रक्रिया पर लगातार उठ रहे सवाल।
- फोटो : अमर उजाला
भारत के अलग-अलग राज्यों में एक साल से ज्यादा समय से जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विपक्ष सरकार को घेरता रहा है। एसआईआर की समयसीमा और इसके तरीके को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। कई राजनीतिक दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग मनमाने ढंग से नाम काट रहा है और बड़े स्तर पर वैध वोटरों के दस्तावेजों की कमी बताकर उनसे मतदान का सांविधानिक अधिकार छीन रहा है।
अब एक अखबार में छपी रिपोर्ट के बाद से चुनाव आयोग की एसआईआर में भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एसआईआर शुरू होने के बाद से ही दो चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और इसके बदलते नियमों पर सवाल उठाए हैं। दावा है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की ओर से इससे जुड़े मुद्दों को 10 महीने में 14 बार उठाया गया। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद से ही विपक्ष ने अब पूरी एसआईआर की प्रक्रिया को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है और आरोप लगाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त, दो आयुक्तों वाले चुनाव आयोग में एसआईआर से जुड़े कई फैसलों पर सहमति नहीं थी। इन दलों ने एसआईआर की प्रक्रिया को गड़बड़ बताया है।
इन घटनाक्रमों के बीच यह जानना अहम है कि आखिर देश के किन-किन राज्यों में अब तक एसआईआर की प्रक्रिया हो चुकी है या जारी है? इसका कहां-किस राज्य पर, क्या असर हुआ है? कहां एसआईआर में सबसे ज्यादा नाम कटे हैं? इसके अलावा जिन लोगों को एसआईआर के बाद नोटिस थमाया गया है, उन्हें जोड़ने में किस राज्य में कितना समय लग सकता है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- किन राज्यों-यूटी में एसआईआर प्रक्रिया पूरी या जारी?
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके किया जा रहा है।
1. जिन राज्य-केंद्र शासित प्रदेश में प्रक्रिया पूरी: पहला और दूसरा चरण
पहला चरण: बिहार में जून से सितंबर 2025 के बीच एसआईआर प्रक्रिया पूरी की गई।
दूसरा चरण: अक्तूबर 2025 से अप्रैल 2026 के दौरान नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची पुनरीक्षण का कार्य पूरा किया गया। इनमें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तमिलनाडु, केरल और गोवा शामिल रहे। उत्तर प्रदेश सहित इन राज्यों में अंतिम मतदाता सूचियां जारी की जा चुकी हैं, हालांकि पश्चिम बंगाल में हटाए गए नामों की अपीलों पर सुनवाई ट्रिब्यूनल्स के जरिए जारी है। इसके अलावा तीन केंद्र शासित प्रदेश- पुदुचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप में भी एसआईआर प्रक्रिया पूरी हुई।
2. जिन राज्यों में अंतिम सूची प्रकाशित या प्रक्रिया जारी: तीसरा चरण
मई 2026 में शुरू हुए तीसरे चरण में 16 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेश शामिल किए गए हैं।
कहां एसआईआर प्रक्रिया पूरी?
मिजोरम
मणिपुर
सिक्किम
अरुणाचल प्रदेश
ओडिशा
चंडीगढ़
कहां अभी सिर्फ मसौदा सूची जारी?
महाराष्ट्र
दिल्ली
तेलंगाना
आंध्र प्रदेश
हरियाणा
पंजाब
उत्तराखंड
नागालैंड
मेघालय
कर्नाटक
झारखंड
त्रिपुरा
दादरा-नगर हवेली
दमन-दीव
जिन राज्यों में मसौदा सूची (ड्राफ्ट रोल) प्रकाशित की गई हैं, वहां नोटिसों और दावों-आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया चल रही है। उदाहरण के तौर पर आंध्र प्रदेश में अंतिम सूची का प्रकाशन 3 अक्तूबर 2026 और नगालैंड में 22 नवंबर 2026 को होना निर्धारित है। यानी इन राज्यों में दावे-आपत्ति तब तक निपटाए जाने हैं।
एसआईआर का कहां-क्या असर हुआ है?
1. चरणवार
एसआईआर में अब तक कितने नामों पर संशय।
- फोटो : अमर उजाला
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एसआईआर में राज्यवार कितने नामों पर संशय।
- फोटो : अमर उजाला
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एसआईआर में राज्यवार कितने नामों पर संशय।
- फोटो : अमर उजाला
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एसआईआर में राज्यवार कितने नामों पर संशय।
- फोटो : अमर उजाला
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एसआईआर में राज्यवार कितने नामों पर संशय।
- फोटो : अमर उजाला
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एसआईआर में राज्यवार कितने नामों पर संशय।
- फोटो : अमर उजाला
अब जानें- जिन राज्यों में मसौदा सूची जारी हुई, वहां क्या हाल?
एसआईआर: ड्राफ्ट रोल में नुकसान उठाने वाले राज्य
राज्य / यूटी
कुल वोटर (एसआईआर से पहले)
कुल वोटर (ड्राफ्ट सूची)
कितने नाम कटे
प्रतिशत कमी
महाराष्ट्र
9.79 करोड़
7.72 करोड़
2.06 करोड़
21.1%
कर्नाटक
5.54 करोड़
4.46 करोड़
1.08 करोड़
19.5%
तेलंगाना
3.38 करोड़
2.65 करोड़
73.40 लाख
21.7%
दिल्ली (NCT)
1.45 करोड़
97.50 लाख
47.60 लाख
32.8%
आंध्र प्रदेश
4.16 करोड़
3.71 करोड़
44.90 लाख
10.8%
झारखंड
2.65 करोड़
2.21 करोड़
43.60 लाख
16.5%
हरियाणा
2.06 करोड़
1.72 करोड़
34 लाख
16.4%
पंजाब
2.15 करोड़
1.94 करोड़
20.70 लाख
9.6%
उत्तराखंड
79.60 लाख
71.30 लाख
8.30 लाख
10.4%
मेघालय
23.50 लाख
21.70 लाख
1.80 लाख
7.7%
नगालैंड
13.60 लाख
12.00 लाख
1.60 लाख
11.7%
दादरा-नगर हवेली और दमन-दीव
4.28 लाख
3.01 लाख
1.27 लाख
29.7%
नोट: ये आंकड़े एसआईआर के ड्राफ्ट रोल स्तर के हैं। इन राज्यों में फॉर्म-6 के माध्यम से पात्र मतदाताओं को जोड़ने और जारी नोटिसों की सुनवाई के बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।
एसआईआर पर क्या हैं विवाद, प्रक्रिया की शिकायत क्यों?
विशेष गहन पुनरीक्षण की राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया के दौरान अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कई प्रशासनिक, राजनीतिक और कानूनी विवाद सामने आए हैं।
1. राष्ट्रीय स्तर पर विवाद
विपक्षी दलों, जैसे- कांग्रेस, सपा, टीएमसी, आप, माकपा, द्रमुक, राजद आदि ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया का मकसद पात्र मतदाताओं को उनके वोटिंग के अधिकार से वंचित करना है। राहुल गांधी सहित कई नेताओं ने सवाल उठाया कि जिन राज्यों में पिछले तीन वर्षों (2023–2025) में चुनाव हुए थे, जैसे- महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश वहीं सबसे अधिक संख्या में नाम क्यों काटे गए।
कई क्षेत्रों में यह डर देखा गया कि एसआईआर प्रक्रिया राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की ओर पहला कदम हो सकती है। खास तौर पर सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लादेशी प्रवासियों और 2002 की सूची से डेटा मैपिंग न होने के कारण हिंदू शरणार्थी, जैसे- मतुआ समुदाय में अनिश्चितता का माहौल बना है। विपक्ष ने भी सवाल उठाए हैं कि आखिर जिन लोगों के वोटिंग अधिकार दस्तावेज की कमी से छीने गए हैं, क्या उनकी नागरिकता पर भी विवादों के घेरे में हो जाएगी।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि 37 लाख से ज्यादा लंबित अपीलों को निपटाने में 24 ट्रिब्यूनल की मौजूदा रफ्तार से 12 साल से ज्यादा (करीब 146 महीने) का समय लग सकता है।
इस बीच टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और कांग्रेस नेताओं ने विधानसभावार हटाए गए नामों और दावों/आपत्तियों के सटीक आंकड़े सार्वजनिक न करने को लेकर शीर्ष अदालत का रुख किया है।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र कांग्रेस ने 2.06 करोड़ (21.14%) मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृतक या डुप्लिकेट (ASDDO) श्रेणी में डालने पर आपत्ति जताते हुए इसे अभूतपूर्व और चिंताजनक बताया और इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की।
विपक्ष का आरोप था कि जनमाष्टमी, बैल पोला और गणेशोत्सव जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान सत्यापन कराया गया और नोटिस देरी से दिए गए, जिससे लोगों को फॉर्म भरने का समय नहीं मिला।
दिल्ली
ड्राफ्ट रोल में 47 लाख (32.78%) मतदाताओं के नाम हटाए जाने के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं- अंजली भारद्वाज और अमृता जौहरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि 33 लाख से अधिक लोगों को बिना कारण, बिना परिभाषा और प्रभावित व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक किए बिना नोटिस जारी कर दिए गए।
उत्तर प्रदेश
ड्राफ्ट सूची में 2.89 करोड़ (18.7%) नाम हटने से सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी दल दोनों चौंक गए। इस पर खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चिंता व्यक्त की थी कि लगभग 4 करोड़ पात्र मतदाता छूट रहे हैं, जिनमें से अधिकांश उनके पारंपरिक मतदाता हैं। लखनऊ (~30%) और गाजियाबाद (~28.8%) जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नाम कटे थे।
इस पर समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि इतने बड़े राज्य में प्रक्रिया को एक-दो महीने में जल्दबाजी में समेटने से बीएलओ पर भारी दबाव पड़ा और असली मतदाताओं के नाम कटे। इसके बाद फाइनल वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में नाम जोड़े गए।
कर्नाटक में कांग्रेस ने महादेपुरा विधानसभा क्षेत्र में फर्जी मतदाताओं और 1.07 करोड़ नाम हटाए जाने पर चुनाव आयोग से जांच की मांग की।
तेलंगाना में ड्राफ्ट सूची से 73 लाख नाम बाहर रहने और 92 लाख मतदाताओं को 2002 की सूची से मैपिंग न होने पर नोटिस थमाए जाने से हड़कंप मचा।
हरियाणा में 33.8 लाख नाम कटने और 19.35 लाख से अधिक सुनवाई नोटिस जारी होने पर भी सवाल उठे।
3. सुप्रीम कोर्ट में मामले का क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के चुनाव आयोग के सांविधानिक अधिकार पर जोर देते हुए एसआईआर प्रक्रिया की कानूनी वैधता को सही ठहराया। हालांकि, प्रक्रिया से जुड़ी कमियों, नोटिसों की अस्पष्टता और ट्रिब्यूनल के बैकलॉग केसों को दूर करने के लिए शीर्ष अदालत लगातार दिशा-निर्देश जारी कर रही है। इसी का नतीजा था कि केंद्र सरकार ने बंगाल में प्रक्रिया को तेज करने के लिए ट्रिब्यूनल की संख्या लोकसभा सीटों के हिसाब से 24 से बढ़ाकर 42 करने और न्यायिक अधिकारियों को वर्क फ्रॉम होम की इजाजत देने की सिफारिश की है, ताकि सुनवाई की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।