अंतिम सम्मान में जुटे लाखों भक्त और अनुयायी
उनके पार्थिव शरीर को अंतिम सम्मान देने के लिए राज्यभर के विभिन्न हिस्सों से लाखों लोग जिला मुख्यालय शहर में जुटे। उनके भक्त और अनुयायी उन्हें 'नादेडदुवा देवारू' (चलते हुए देवता) के रूप में मानते थे। कई लोगों ने लोगों ने अपने प्रिय संत सिद्धेश्वर अप्पाव्रु को अश्रुपूर्ण विदाई भी दी। उनके भक्त और अनुयायी कर्नाटक, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में भी फैले हुए हैं।
'अंतिम अभिवादन पत्र' वाली वसीयत में संत ने क्या लिखा था?
संत सिद्धेश्वर स्वामी का अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार ज्ञानयोगाश्रम में किया गया, जिसे उन्होंने 2014 में गुरु पूर्णिमा के दिन गवाहों के रूप में दो जिला न्यायाधीशों द्वारा हस्ताक्षरित 'अंतिम अभिवादन पत्र' शीर्षक वाली वसीयत के रूप में रिकॉर्ड किया था। इसमें कहा गया है कि उनके नश्वर अवशेषों को आग की लपटों में चढ़ाया जाना है और दफनाया नहीं जाना है, कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया जाना है और उनकी राख को नदी या समुद्र बिखेरना है और उनकी स्मृति में कोई स्मारक या भवन बनना है।
सरल जीवन जीते थे संत सिद्धेश्वर स्वामी
मृदुभाषी और सरल दिखने वाले संत सिद्धेश्वर स्वामी बहुत ही सरल जीवन जीते थे। आश्रम में अंतिम संस्कार से पहले यहां सैनिक परिसर में उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटकर कर्नाटक सरकार और पुलिस ने पूर्ण राजकीय सम्मान दिया।