इसे सरकारी व्यवस्था कहें या उसके लूपहोल, मध्य प्रदेश में मासूम जिंदगियां छीन लेने वाली कफ सिरप निर्माता कंपनी अब तक सरकारी नजरों से ओझल थी। तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित एक कंपनी कफ सिरप सहित कई तरह की जेनेरिक दवाएं बनाती है फिर उन्हें पुद्दुचेरी, ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित देशभर के बाजार में पहुंचाती है। डॉक्टर की पर्ची या सीधे दुकान से खरीदकर अभिभावक इन दवाओं को बच्चों को पिलाते हैं, लेकिन केंद्र सरकार को यह सब पता ही नहीं चलता।
यह जानकारी शायद भरोसे लायक न लगे लेकिन सच यही है कि मध्य प्रदेश में जब बच्चों की मौत होने लगी और मामला दिल्ली तक पहुंचा तो शुरुआती जांच में किसी भी जहरीले रसायन का पता नहीं चला लेकिन अचानक से 3 अक्तूबर की रात तमिलनाडु ने जब दो दिन की जांच में कंपनी की फैक्टरी पर ताला जड़ दिया तो दिल्ली तक यह सूचना देर रात में पहुंची। लेकिन केंद्रीय अफसर भौचक्का अगले दिन सुबह होते ही दिल्ली के एफडीए भवन में रिकॉर्ड रूम खंगाला गया लेकिन कोल्ड्रिफ सिरप या श्रीसन फार्मा कंपनी का नाम कागजों में नहीं मिला।
एक कंपनी सरकारी निगरानी से बाहर रहे, यह कैसे संभव हो सकता है? इस पर केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) का जवाब मिला कि तमिलनाडु ने दवा कंपनी को लाइसेंस दिया। पांच साल बाद लाइसेंस नवीनीकरण भी किया लेकिन इसकी जानकारी सीडीएससीओ के साथ कभी साझा नहीं की। पूरे घटनाक्रम पर सीडीएससीओ के शीर्ष अधिकारी ने कहा, साल 2011 में श्रीसन फार्मा कंपनी को पहली बार राज्य सरकार से लाइसेंस मिला और 2016 में नवीनीकरण भी किया गया।
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उनके मुताबिक, यह फैक्टरी कहां है, क्या बना रही है? कैसे संचालित हो रही है? यह सभी जानकारी राज्य ने सीडीएससीओ के साथ कभी साझा नहीं की। उन्होंने बताया, केंद्र और राज्य के बीच इस तरह के अंतर को खत्म करने के लिए 2017 के दौरान नियमों में संशोधन करते हुए तय किया गया था कि लाइसेंस देने से पहले निरीक्षण अनिवार्य है और यह केंद्र व राज्य दोनों मिलकर करेंगे। हालांकि यह व्यवस्था नए लाइसेंस के लिए लागू हुई जबकि श्रीसन फार्मा पहले से ही लाइसेंस प्राप्त थी, इसलिए नियमों में संशोधन के बाद भी इसका रिकार्ड तमिलनाडु ने साझा नहीं किया।
बच्चों की मौत से जांच तक का पूरा घटनाक्रम
अधिकारी ने बताया कि छिंदवाड़ा में बच्चों की मौत की सूचना मिलने के बाद केंद्र ने एक टीम बनाई और वहां जाकर अलग-अलग दवाओं से सहित कुल 19 नमूने एकत्रित किए। छह नमूनों की जांच केंद्रीय टीम ने की और बाकी 13 नमूनों की जांच मध्य प्रदेश के औषधि नियंत्रण विभाग को सौंपी गई।
यह प्रक्रिया 29 सितंबर से दो अक्तूबर तक चली और तब तक कफ सिरप या डायएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) की पहचान नहीं हुई थी। केंद्रीय टीम को जांच में किसी भी नमूने में डीईजी नहीं मिला। इसके बाद तीन नमूनों पर मध्य प्रदेश की रिपोर्ट सामने आई जिसमें यह रसायन नहीं मिला।
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इस बीच स्थानीय अधिकारियों की सिफारिश पर मध्य प्रदेश ने तमिलनाडु को पत्र लिख कोल्ड्रिफ और श्रीसन फार्मा के बारे में सूचित किया। 3 अक्तूबर तक मौत के कारणों का पता नहीं चला लेकिन देर रात तमिलनाडु से सूचना मिली कि श्रीसन फार्मा के कफ सिरप में करीब 48 फीसदी डीईजी मिला है जो तय सीमा 0.1 से काफी अधिक और जानलेवा है। इसलिए उन्होंने फैक्टरी को सील कर दिया है।
इसके बाद पूरा मामला ही पलट गया। चूंकि सीडीएससीओ के पास कंपनी और दवा का ब्योरा नहीं था। इसलिए यह भी हो सकता है कि दूसरे राज्यों को भी इसकी जानकारी न हो, इसलिए जब अलर्ट जारी हुआ तो बाकी राज्यों ने भी इस दवा पर प्रतिबंध लगाना शुरू किया।
क्या श्रीसन जैसी और भी कंपनियां हो सकती हैं?
यह पूछने पर कि क्या और भी ऐसी कंपनियां हो सकती हैं, अधिकारी ने कहा कि कुछ दिन पहले तक इस सवाल का जवाब एक बार में ना बोलकर दिया जा सकता था लेकिन अभी 100 फीसदी कुछ कह पाना संभव नहीं है। हमें पूरी उम्मीद है कि ऐसी अन्य कोई कंपनी किसी और राज्य में नहीं है। इसी तथ्य का सत्यापन करने के लिए हमने सभी राज्यों से उनके यहां की कफ सिरप निर्माता कंपनियों की जानकारी मांगी है। इसके बाद देश की इन सभी कफ सिरप निर्माता कंपनियों का ऑडिट किया जाएगा।