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शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल बोले- दलबदल के पाप को बढ़ावा नहीं दे सकते; 18 अगस्त को फिर सुनवाई

Thu, 13 Aug 2026 06:34 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

शिवसेना विवाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल सवाल पार्टी में वास्तविक विभाजन और विधायक दल में टूट के बीच अंतर का है। सिब्बल ने दलील दी कि संविधान की व्याख्या दलबदल विरोधी कानून के उद्देश्य को कमजोर करने वाली नहीं होनी चाहिए। अब 18 अगस्त की सुनवाई में इस विवाद पर आगे की दलीलें सुनी जाएंगी।
 
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कपिल सिब्बल, वरिष्ठ अधिवक्ता - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को लगातार पांचवें दिन तीखी बहस हुई। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि संविधान के प्रावधानों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे उस ‘पाप’ को बढ़ावा मिले, जिसे रोकने के लिए दलबदल विरोधी कानून बनाया गया है।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ उद्धव गुट की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में निर्वाचन आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया था। चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न दिया था।

दलबदल कानून के मकसद पर सिब्बल की दलील
अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि विधायक की अयोग्यता और राजनीतिक दल में विभाजन को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। अयोग्यता तय करते समय बाद की घटनाओं पर विचार किया जा सकता है, लेकिन यह तय करने के लिए कि पार्टी में वास्तव में विभाजन हुआ था या नहीं, बाद की घटनाओं को आधार नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास देश और लोकतंत्र के भविष्य के लिए कानून की स्पष्ट व्याख्या करने का अवसर है।
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सिब्बल ने यह भी कहा कि सत्ता में रहने वाली पार्टी अगर अयोग्यता पर फैसला टलवाती रहे तो यह बेहद दुखद स्थिति होगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है। इस पर पीठ ने कहा कि यह सामूहिक जिम्मेदारी है। पीठ ने कहा, 'हम अपनी भूमिका से अवगत हैं। संविधान लोगों के जरिए जीवंत रहता है।'

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह भी कहा कि दूसरे संस्थानों को कमतर नहीं आंकना चाहिए और वे भी अपनी जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध हैं। सिब्बल ने जवाब दिया कि अंततः कानून की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट को ही करनी होगी। संसद कानून बनाती है, लेकिन उसके बनाए कानूनों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।

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विधायक दल में टूट ही पार्टी का विभाजन नहीं
बुधवार की सुनवाई में पीठ ने कहा था कि पहले यह देखना होगा कि शिवसेना में वास्तव में विभाजन हुआ था या नहीं। पीठ ने यह भी कहा था कि विभाजन विधायक दल से शुरू होकर संगठन और प्राथमिक सदस्यता तक पहुंच सकता है। सिब्बल ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल में विभाजन केवल विधायक दल में टूट से नहीं हो सकता। उनके मुताबिक. संविधान पीठ के एक फैसले में यह सिद्धांत पहले ही तय किया जा चुका है।

उन्होंने निर्वाचन आयोग के आकलन पर भी सवाल उठाया। सिब्बल ने पूछा कि आयोग ने यह तय करते समय किन आधारों पर माना कि पार्टी के भीतर वास्तविक विवाद था और क्या शिंदे गुट ने शिवसेना के संविधान के तहत उपलब्ध आंतरिक उपायों का इस्तेमाल किया था।

संगठन और पार्टी प्रमुख की शक्तियों पर भी सवाल
सिब्बल ने शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे, पार्टी प्रमुख की शक्तियों और संगठनात्मक पदों पर नियुक्ति के तरीके को लेकर भी निर्वाचन आयोग के आकलन को चुनौती दी।

यह विवाद 2024 में उद्धव गुट की ओर से दायर दो याचिकाओं से जुड़ा है। इनमें निर्वाचन आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट को ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न दिया गया था। याचिकाओं में 17 फरवरी 2023 के निर्वाचन आयोग के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट को मूल शिवसेना माना गया था। मामले में आगे की दलीलें 18 अगस्त को जारी रहेंगी।
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क्या है सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल?
शिवसेना विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विधायक दल में टूट को ही राजनीतिक दल में विभाजन माना जा सकता है? उद्धव गुट का कहना है कि पार्टी के संगठन और सदस्यता में वास्तविक विभाजन के बिना केवल विधायकों की संख्या के आधार पर राजनीतिक दल के विभाजन का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। सिब्बल की दलील का दूसरा अहम पहलू यह है कि संविधान की व्याख्या ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे दलबदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाए।
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