शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। वहीं, यूपीए काे एनजीओ करार देते हुए शिवसेना ने इसका नेतृत्व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मुखिया शरद पवार को सौंपने की वकालत की है। राहुल पर सवाल उठाने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि शिवसेना के इस कदम का प्रभाव महाराष्ट्र की महाविकास अघाडी सरकार पर पड़ता है या नहीं।
मोदी-शाह जैसा नेतृत्व यूपीए में कहीं नहीं : शिवसेना
शिवसेना ने कांग्रेस से सवाल किया है कि भाजपानीत एनडीए में नरेंद्र मोदी है, अमित शाह है। यूपीए के पास क्या है? शिवसेना ने कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधते हुए शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा कि विरोधी दल के लिए एक सर्वमान्य नेता की आवश्यकता होती है, लेकिन इस मामले में देश का विपक्ष पूरी तरह से दिवालिएपन के हाशिए पर खड़ा है।
शनिवार को ‘सामना’ में प्रकाशित संपादकीय में शिवसेना ने कहा कि एनडीए में भाजपा पूरी ताकत के साथ सत्ता में है। एनडीए के पास नरेंद्र मोदी जैसा नेतृत्व है और अमित शाह जैसा राजनीतिक प्रबंधक है। लेकिन यूपीए में ऐसा कोई नहीं दिखाई देता। संपादकीय में लिखा कि विरोधी दलों की अवस्था उजड़े गांव की जमींदारी की तरह हो गई है जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के भविष्य को लेकर भ्रम बना हुआ है। दिल्ली की सीमा पर एक महीने से किसानों का आंदोलन शुरू है लेकिन सत्तापक्ष बेफिक्र है। शिवसेना ने कहा है कि किसान आंदोलन के प्रति सरकार की बेफिक्री के लिए मोदी-शाह नहीं बल्कि देश का विरोधी दल जिम्मेदार है।
बता दें, महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर सरकार का गठन किया है। वहीं, वर्तमान में यूपीए की कमान कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों में हैं।
संपादकीय में कहा गया है कि भाजपा का विरोध करने के लिए जब तक यूपीए के सभी दल शामिल नहीं होंगे, तब तक विपक्ष सरकार के आगे बेअसर नजर आएगा। शिवसेना ने कहा, प्रियंका गांधी को दिल्ली की सड़क पर हिरासत में लिया गया, राहुल गांधी का मजाक उड़ाया गया, यहां महाराष्ट्र में सरकार को काम करने से रोका जा रहा है, यह पूरी तरह लोकतंत्र के खिलाफ है।
कमजोर विपक्ष के कारण सरकार किसानों को लेकर बेफिक्र
शिवसेना ने विपक्ष को निशाने पर लेते हुए अपने संपादकीय में लिखा, किसानों द्वारा दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन किया जा रहा है। सत्ता पक्ष को इस आंदोलन की फिक्र नहीं है। सरकार के इस रवैया का कारण है, कमजोर विपक्ष। मौजूदा विपक्ष पूरी तरह बेजान है, विपक्षियों की अवस्था बंजर गांव के मुखिया का पद संभालने जैसी है। इस कारण ही प्रदर्शन कर रहे किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। बंजर गांव के हालात को सुधारने की जरूरत है। विपक्ष के इस हाल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृह मंत्री अमित शाह जिम्मेदार नहीं हैं। विपक्ष इसका जिम्मेदार है और इसे आगे आकर इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी।
पवार के अलावा किसी ने आवाज नहीं उठाई
सामना ने लिखा गया है कि यूपीए नाम के एक राजनीतिक संगठन की कमान कांग्रेस नेतृत्व के हाथ में है। यूपीए वर्तमान में एक एनजीओ की तरह प्रतीत हो रहा है, यही वजह है कि इस गठबंधन में शामिल पार्टियां किसान आंदोलन को लेकर बेफिक्र हैं। एनसीपी के अलावा इस गठबंधन में शामिल किसी भी पार्टी ने मुखर होकर आवाज नहीं उठाई है।