वॉटर वुमन शिप्रा पाठक को पर्यावरण के लिए उनके योगदान के लिए जाना जाता है। उन्हें मां मोक्षदायिनी शिप्रा या वॉटर वुमन ऑफ इंडिया भी कहते हैं। उन्होंने मां नर्मदा का भ्रमण किया है। वे युवाओं को पर्यावरण के बारे में जागरूक करने के अभियान काम कर रही है। उन्होंने अमर उजाला से नर्मदा, पर्यावरण व कैलाश मानसरोवर यात्रा पर अपने विचार रखे। आइए उस बारे में जानें।
जब एक आदमी किसी समाज की समस्या से जूझता है तो, तो उसकी आवाज बनती है। उसपर एक समाज का अधिकार हो जाता है। इसी कड़ी में एक समाचार पत्र में एक आर्टिकल आया। वहीं से वॉटर वुमन शब्द आया। इसके साथ ही झाड़ वाली बाई, पानी वाली माई, जलकन्या ये सब भी चल रहे हैं। इन नामों से भी बुलाया जाने लगा।
मैं आध्यात्मिक स्त्री हूं। इसलिए मैं बोल रही हूं। बचपन बहुत हद तक पूर्वजन्म के कर्म से जुड़ा होता है। क्योंकि एक जैसी परिस्थिति में भी रहने पर जीवन किसी का सुंदर किसी का निकृष्ट हो सकता है। उदाहरण के लिए राम और रावण, अर्जुन और दुर्योधन को ले सकते हैं। इसके अलावा मां का लालन पालन कैसा होता है, उस पर भी जीवन निर्भर करता है। मैं गुड्डे गड़ियों ने नहीं खेली। मां ने पहली जो कहानी सुनाई वह दुष्यंत शकुंतला की थी। मेरा शिप्रा नाम रखा गया। इससे आध्यात्मिक लगाव बढ़ा। इसके बाद मैं हजारों किमी दूर नर्मदा जी की सेवा करने चली आई।
नदियों की यात्रा का आपके लिए क्या अनुभव रहा?
मैंने नदियों की यात्रा के तहत 13000 किलोमीटर की पदयात्रा मैंने की है। मैं 23 राज्य घूमी हूं। आठ-दस देश बाहर घूमी हूं। इन सबमे नर्मला सबसे अलग है। यह केवल नदी नहीं है। यह केवल पानी का स्रोत नहीं है। नर्मला जो है यह समझ से परे है। नर्मला की अच्छाई को आप माप नहीं सकते हैं। नर्मदा अच्छी हैं, सच्ची हैं, सुंदर हैं, विलक्षण हैं, इन्हें शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता है। जो नर्मदा के पास जाएगा, वही इसे समझेगा। नर्मला सबसे सुंदर नदी है। यह सबसे जागृत नदी है। इसे जागृत नदी ने स्वयं ने नहीं बनाया। नर्मदा जी को विलक्षण बनाने वाले उसके तट के लोग हैं। बाढ़ के समय यह आदिवासियों से सबकुछ छीनकर ले जाती है, पर लोग फिर भी मुस्कुराकर करते हैं कि क्या हुआ, माई ने ही तो दिया था, वो ही ले गई। लोग नुकसान के बाद भी संतुष्ट दिखते हैं। इसी तरह नर्मदा से मुझे प्रेम है। मुझे भी सिवाय पर्यावरण के कुछ दिखता नहीं है। शुरुआत में लोगों ने इसे सिरफिरापन भी कहा। फिर धीरे-धीरे लोग समझे। मैं मानती हूं पृथ्वी पर जल की पहली बूंद नर्मदा है। प्रकृति के प्रति प्रेम के कारण ही हमने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान छह राज्यों के 31 विवि में एक सिंदूर का पौधा लगाया। हमने वहां पांच-पांच पौधे भिजवाया। विश्वविद्यालयों ने भी सहयोग किया। इसीलिए यह भारत है।
सिंदूर वृक्ष के बारे में बताइए?
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमें लगा कि इसे श्रद्धांजलि देने के लिए हमें कुछ करना चाहिए। हमने इसलिए अधिक से अधिक मांगों तक सिंदूर पहुंचाने का बीड़ा लिया। सिंदूर में कैमिकल के नुकसान के कारण लोग इसका इस्तेमाल कम करने लगे हैं। इसे देखते हुए हमने प्राकृतिक सिंदूर के पौधों का रोपण करने निर्णय लिया। जब भी कोई बड़ा तत्व छोटे तत्व से अपनी तुलना करेगा तो हम उससे छोटे हो जाते है। भारतीय महिलाओं को पुरुषों से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। उन्हें आर्गेनिक सिंदूर का इस्तेमाल करना चाहिए।
युवाओं को प्रकृति से कैसे जोड़ें?
धर्म के बाद शिक्षा ही यह बता सकती है कि कैसे संस्कृति के अनुकूल रहें। यही वह माध्यम है जो यह बता सकती है कि संस्कृति और पर्यावरण को कैसे बचाए रखें। मैं अंग्रेजी की विरोधी नहीं हूं। लेकिन अग्रेजी को हमें टूल की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। मातृभाषा को मालिक की तरह ट्रीट करना चाहिए। इंग्लिश आती इसे ऐटीट्यूड में नहीं लाना चाहिए। हमने उल्टा कर दिया है। पर्यावरण अब एक आवश्यक विषय हो गया है। अब वे केवल मार्कशीट पर निर्भर न रहें। हमें चाहिए कि विद्यार्थियों के हाथ गोबर से, मिट्टी से, खाद से लबालब हो जाएं। उन्होंने पौधरोपन के लिए प्रेरित करना चाहिए। पेपर और कागज पर बात करके हम केवल युवाओं को पर्यावरण के प्रति जागरूक नहीं कर सकते।
महाकुंभ के दौरान गंगा के पानी के दूषित होने से जुड़े कई रिपोर्ट आए, इसे आप कैसे देखती हैं?
ये रिपोर्ट जिन्होंने ये सर्कुलेट की थी, उन्हें मैं कहना चाहती हूं कि मां का आंचल कभी गंदा होता। और यह कितना गंदा हो जाए उससे बच्चे को नुकसान नहीं होता। ये रिपोर्ट भारतीय संस्कृति पर एक प्रहार की तरह था। इस रिपोर्ट को छह महीने पहले आने चाहिए था। ऐन मौके पर इसका आने का मतलब था कि यह जानबूझकर किया गया एक षडयंत्र था। जब प्रचंडता से कोई हवन होता है, सूरज निकल रहा है उसे कोई दबा नहीं सकता है। इसलिए ऐसे षड्यंड धूमिल रहे। बजाय आलोचना करने के हमने लोगों के जागरूक करने के अभियान चलाए। हमने कचड़े से निपटारे के लिए एक थैला एक थाली अभियान चलाया। पंचतत्व संस्था इसमें गिलहरी के तरह काम कर रही थी। इसके अलावे 250 संस्थानों ने इसमें योगदान दिया। इस दौरान 11 लाख स्टील की थाली और थैले हमने बांटे। यह कुछ सकारात्मक करने का सुखद तरीका है।
मानसरोवर यात्रा छह साल बाद शुरू होने वाली है, आपने यात्रा की है, इस पर आप क्या कहेंगी?
कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान मैंने जो सेवाएं की वह मेरे के लिए अद्भुत अनुभव था। कैलाश पर जाने से पहले और आने के बाद आप पूरी तरह बदल जाते हैं। कैलाश से पहले मैं नर्मदा को बहुत पढ़ती थी। मैंने यात्रा के दौरान कैलाश से नर्मदा मांगी। वहां से आने के बाद मेरी नर्मदा यात्रा पूरी हुई। वहां जाकर अहसास हुआ कि खाली हाथ में ही कैलाश समा सकता है। पूर्व की पीड़ा किसी उद्देश्य के लिए थी। वहां ऑक्सीजन कम होता है। जब आप कैलाश की परिक्रमा करते हैं तो आपको केवल लिक्विड डायट पर रहना होता है। पर ऐसा होने का मतलब है कि शिव बता रहे हैं क उनका जो स्थान है वहां हर को नहीं आ सकता है।
सावन के महीने में पौधरोपण को लेकर आप क्या कहना चाहेंगी?
मिट्टी जरूरी है, जल जरूरी है, पौधा जरूरी है यह लोगों को समझाने की जरूरत है। इनमें जीवन के भविष्य का रहस्य छिपा है। इसमें जीवन का चिंतन छिपा है। अपने अपने पर्यावरण को समझने की जरूरत है। सावन में शिवलिंग पर बेल के पत्ते चढ़ाने का चलन है। हम आज ऐसा कर पा रहे हैं, क्योंकि बेल के पौधे हमारे पूर्वजों ने लगाए थे। इसलिए हम उसे तोड़कर शिवलिंग पर चढ़ाकर अपनी मनोकामना पूरी करने की अभिलाषा कर पा रहे हैं। हमारी आने वाली पीढ़ी भी ऐसा कर सके इसलिए हमें भी बेल के पौधरोपण करना चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ी में भी लोगों को यह मौका मिल सके। जितने भी हमारे कांवड़िया भाई और बहन जाएं, वे जहां से वे लेकर जाएं या जहां कांवड़ चढाएं वहां पौधरोपण करें। बेलपत्र का पौधरोपण अधिक से अधिक करें। इसके अलावे देववृक्ष, आंवला, नीम, पीपल, बरगद, पाकड़ ये ऐसे वृक्ष हैं जो आपको सिर्फ देंगे ही देंगे। इनके टहनियों से लेकर पत्ते तक से औषधियां बनेंगी। पूरा आयुर्वेद पूरा इन्हीं वृक्षों से जुड़ा हुआ है।