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शीला दीक्षित ने दिए संकेत, केजरीवाल के साथ दिल्ली में कांग्रेस के गठजोड़ की संभावना खत्म !

Sun, 13 Jan 2019 07:03 PM IST
Nilesh Kumar अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
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aap and congress
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कांग्रेस अध्यक्ष बनने के पहले शीला दीक्षित ने आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस के गठबंधन के संकेत दिये थे। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन को इस संभावित गठबंधन की राह में रोड़े के तौर पर देखा जा रहा था। उम्मीद थी कि अजय माकन के जाते ही गठबंधन की राह तैयार कर दी जाएगी, लेकिन हाल ही में दोनों पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा एक दूसरे के खिलाफ जमकर बयानबाजी से दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन बनने की संभावना अमल में आती नहीं दिख रही। 
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दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित ने अध्यक्ष के रुप में पद संभालते ही अरविंद केजरीवाल को संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान न करने वाला आदमी बताया और कहा कि ऐसे व्यक्ति के साथ काम करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि केजरीवाल दिल्ली को नहीं समझते हैं और उनकी पार्टी से गठबंधन की कोई संभावना नहीं है। 

वहीं अरविंद केजरीवाल ने भी अपनी सभाओं में कांग्रेस पर हमला करना तेज कर दिया है। शनिवार को एक सभा में उन्होंने एक बार फिर अपने पुराने तेवर में कहा कि कांग्रेस को वोट करने का मतलब है कि भाजपा को वोट देना। क्योंकि वह खुद तो जीतने में सक्षम नहीं है लेकिन वोट काटकर भाजपा की जीत की राह तैयार कर देती है।
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...और इस तरह फंस गया पेच 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक सबसे बड़ी समस्य़ा यह है कि अगर दिल्ली में लोकसभा चुनाव में आप पार्टी के साथ गठबंधन हो भी जाता है तो उसके साल भर के अंदर ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने हैं। उस स्थिति में पार्टी को दिल्ली में वापसी के लिए केजरीवाल सरकार पर हमला करना होगा जो ऐसी स्थिति में उचित नहीं होगा। 

नेता के मुताबिक पार्टी के ज्यादातर नेताओं की राय है कि चाहे लोकसभा चुनाव का परिणाम जो भी हो, लेकिन दिल्ली में पार्टी की जमीन तैयार करने के लिए चुनाव में अकेले ही जाने में समझदारी है। पार्टी की इसी सोच का परिणाम शीला और केजरीवाल के हमलावर शब्दों में साफ मिल जाता है। 

एक अन्य नेता ने कहा कि अरविंद केजरीवाल के पास आज जो वोट है कमोबेश वह कांग्रेस का ही वोट है। इसलिए अगर उसे दिल्ली में वापसी करनी है तो उसके लिए आप को उखाड़ना होगा जो गठबंधन रहते नहीं किया जा सकता। 
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...आखिर क्या चाहते थे केजरीवाल

दरअसल सबसे बड़ी समस्या इस बात को लेकर थी कि दिल्ली में लोकसभा की कुल सात ही सीटें हैं। ऐसे में कोई भी पार्टी बहुत कुछ छोड़ने या देने की स्थिति में नहीं है। दिल्ली में अपनी मौजूदा मजबूत स्थिति को देखते हुए आप चार से पांच सीटों से पीछे हटने को तैयार नहीं थी। लेकिन एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उभरने को आतुर कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर लड़ने के लिए तैयार नहीं थी। 

आप ने ऐसी स्थिति में दिल्ली में ज्यादा सीटें छोड़ने के बदले पंजाब या हरियाणा में बदले में सीटों की मांग रखी थी। लेकिन कांग्रेस के साथ परेशानी यह है कि वह पंजाब में सत्ता में है तो आम आदमी पार्टी मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है। ऐसे में सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच गठबंधन की स्थिति उसकी राष्ट्रीय छवि के लिहाज से सूट नहीं करती है। 

हरियाणा में भी कांग्रेस-आप में तालमेल नहीं

खबर है कि हरियाणा यूनिट ने भी कांग्रेस नेतृत्व से अपने यहां सीटों के तालमेल करने से साफ इंकार कर दिया है। भूपेंद्र  हुड्डा और दीपेंद्र हुड्डा ने राज्य में अपनी मजबूत स्थिति से आलाकमान को लोकसभा चुनाव में अधिकतम सीटें जीतने का दावा किया है। कुमारी शैलजा भी आप को हरियाणा में पैर पसारते नहीं देखना चाहती हैं। 

कांग्रेस पार्टी को लगता है कि दिल्ली की तरह आप एक बार वहां भी मौका मिलने पर कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी कर सकती है। दिल्ली में कांग्रेस का ही सहारा पाकर आप उठ खड़ी हुई और बाद में कांग्रेस के लिए ही खतरा बन गई। पार्टी नेताओं को लगता है कि अगर उस मौका मिला तो हरियाणा और पंजाब दोनों राज्यों में इसी तरह की स्थिति बन सकती है। इसलिए बेहतर है कि आप को दिल्ली में ही समेटे रखा जाए। इन्हीं कारणों को देखते हुए फिलहाल कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन की संभावना बनती नहीं दिखती।   
 
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