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11 में से 10 मामलों में बरी, फिर भी जेल में बिताए 16 साल

Wed, 26 Apr 2017 06:15 AM IST
राजीव सिन्हा / अमर उजला, दिल्ली
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आतंकी गतिविधियों से जुड़े 11 मामलों में से 10 में बरी होने के बावजूद एक कश्मीरी को 16 वर्षों से सलाखों के पीछे रखने को सुप्रीम कोर्ट ने ‘शर्मनाक’ बताया है। गुलजार अहमद वानी नाम के इस कश्मीरी पर अब सिर्फ बाराबंकी में हुए ट्रेन धमाके का मामला लंबित है।
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बाकी सभी मामलों में उसे या तो बरी कर दिया गया है या आरोपमुक्त कर दिया गया है। वानी को 30 जुलाई 2001 को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। वह उस वक्त अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में अरबी में पीएचडी कर रहा था।

वानी मूलरूप से जम्मू एवं कश्मीर के बारामूला जिले का रहने वाला है। उस पर उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने का आरोप था। बाराबंकी में साबरमती एक्सप्रेस में हुए धमाके में नौ लोगों की मौत हुई थी।
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जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि अगर बाराबंकी में वर्ष 2000 में साबरमती एक्सप्रेस में हुए धमाके के मामले में 31 अक्टूबर तक अहम गवाहों के बयान दर्ज नहीं हुए तो एक नवंबर को आरोपी को जमानत दे दी जाएगी। पीठ यह जानकर हैरान थी कि अदालती निर्देश के बावजूद इस मामले में गवाहों के बयान दर्ज करने का काम पूरा नहीं हो सका। पीठ ने इसे बेहद दुखद बताया।
वानी के वकील ने पीठ को बताया कि वानी पर 11 आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से 10 मामलों में उसे बरी किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि वानी 16 वर्षों से जेल में बंद है। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पीएन मिश्रा ने कहा कि आरोपी वानी साबरमती एक्सप्रेस धमाके के मामले में इतने वर्षों से जेल में बंद नहीं है।

इस पर पीठ ने घोर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ‘11 मामले में वानी को 10 मामलों में बरी कर दिया गया है। परेशानी यह है कि आप लोग उसे जेल में तो रखना चाहते हैं लेकिन साक्ष्य जुटाने और जल्द ट्रायल पूरा करने में आपकी कोई दिलचस्पी नहीं होती। यह शर्मनाक है।’

पीठ ने पाया कि 14 दिसंबर , 2015 में वानी की याचिका को स्वीकार किया गया था। उस वक्त पता चला था कि 96 गवाहों में से महज छह गवाहों के बयान दर्ज हुए थे। नौ सितंबर, 2016 तक महज 20 गवाहों के ही बयान दर्ज हुए थे। जिसके बाद अदालत ने छह महीने के भीतर सभी के बयान दर्ज करने का निर्देश दिया था लेकिन अब तक यह पूरा नहीं हो सका है। पीठ ने सरकार से कहा कि ऐसा लगता है आप गंभीर नहीं है। 
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