सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त वार्ताकार संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन शुक्रवार को शाहीन बाग के प्रदर्शन स्थल पर जाकर महिलाओं से बातचीत कर मसले का हल निकालने की कोशिश करेंगे। वार्ता पिछले दो दिनों से जारी है। वार्ताकारों के सामने प्रदर्शनकारी महिलाएं ऐसे-ऐसे तर्क दे रही हैं जिसे सुनकर देश की सर्वोच्च अदालत में बहस करने में माहिर दोनों वरिष्ठ वकील भी हैरान रह जाते हैं।
वार्ताकारों संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन ने प्रदर्शनकारी महिलाओं से यही अपील की कि शाहीन बाग के धरना स्थल को बदलने पर विचार किया जाना चाहिए क्योंकि इस धरने के कारण उन्हीं के जैसे देश के सामान्य नागरिकों को परेशानी हो रही है।
एक अन्य महिला ने तर्क दिया कि कुछ ही दिन पहले जाटों को आरक्षण देने की मांग पर रेल की पटरियां रोकी गईं थीं। धरने-प्रदर्शन किये गये थे। उसमें भारी हिंसा हुई थी और लोगों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। जबकि इस शाहीन बाग के आंदोलन से किसी को शारीरिक या संपत्ति का नुकसान नहीं हो रहा है।
ऐसे में इस आंदोलन को गलत कैसे कहा जा सकता है? महिलाओं की घोर आपत्ति इस बात पर थी कि जब अन्य आंदोलनों को राष्ट्रविरोधी नहीं बताया गया तो शाहीन बाग के आंदोलन को राष्ट्रविरोधी क्यों करार दिया जा रहा है?
दोनों वरिष्ठ वकीलों ने प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त करना चाहा कि यह मसला केवल प्रदर्शन स्थल को लेकर हो रही परेशानी को लेकर है। नागरिकता संशोधन के मुद्दे भी सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन हैं और उस समय प्रदर्शनकारियों का पूरा पक्ष सर्वोच्च अदालत के समक्ष रखा जाएगा।
महिलाओं ने कहा कि वे केवल इतना बताएं कि नागरिकता संशोधन में सिर्फ मुस्लिमों को अलग क्यों रखा गया। अनेक खबरें आई हैं जिसमें यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार इस समय भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान के अनेकों हिन्दुओं-मुस्लिमों को नागरिकता दे रही है। ऐसे में इस कानून को लाकर सरकार क्या साबित करना चाहती है।
सामान्य महिलाओं के ऐसे-ऐसे तर्क सुनकर वार्ताकार भी चुप हो जाते हैं। हालांकि उनकी कोशिश धैर्य के साथ उनकी बात सुनने और उन्हें यह विश्वास दिलाने की रहती है कि वे उनके प्रदर्शन के अधिकार को रोकने या कम करने को समर्थन नहीं देते हैं और वे उनके साथ पूरी तरह सहमत हैं।
लेकिन वे केवल इतना चाहते हैं कि प्रदर्शन के कारण दूसरे बेकसूर लोगों को परेशानी न हो। दोनों पक्षों में आज भी एक सीमित माहौल में बातचीत हो सकती है।