शौहर होने के गुरूर में बार बार जुल्म करना उसकी आदत बन गई थी। 22 साल में इंतहा हो गई तो शबनम का कलेजा भी मजबूत हो गया। शबनम का कहना है कि इस निकाह को बचाने के लिए न तो कोर्ट जाना चाहती है और न मौलानाओं के सामने ही गिड़गिड़ाएगी। बाकी जिंदगी अपने बच्चों के साथ अकेले ही गुजार लेगी। शरियत के हुक्म की पाबंद है इसलिए तलाक मंजूर है। तमाम चुनौतियां भले ही हों पर उनसे निपटने के लिए उसने मन बना लिया है।
हाफिजगंज कस्बे की रहने वाली शबनम को उसके पति आजाद शाह ने केवल इसलिए तलाक दे दिया था कि उसने उसको गलत रास्ते पर जाने से रोका था जोकि शरियन एक बीवी का फर्ज भी था। अपने पति को नेक बनाना चाहती थी।
चोरी और नशा करने से जब जब उसने पति को रोका, बदले में लात घूंसे और गालियां ही मिलीं। एक बार तो जालिम ने उसको छत से नीचे फेंक दिया। वह आज भी ठीक से चल नहीं पाती। पति ने उसी शरियत का अस्त्र बनाकर शबनम की जिंदगी तबाह कर दी। शबनम का कहना है कि उसको तलाक मंजूर है। अब किसी फतवे की भी जरूरत नहीं।
शबनम के बेटे मुश्ताक ने कड़ी मेहनत से एक कमरा हाफिजगंज में बनाया। इसमें ही उसका पूरा परिवार रहता है। घर का खर्च बेटा मुश्ताक और बेटी आफरीन कढ़ाई करके उठाते हैं। वह चाहती है कि यह मकान उसको ही मिले। इसे बेचकर वह अपने बच्चों के साथ दूसरी जगह रहना चाहती है। लड़कियों की शादी करने और रहने की समस्या अब उसके सामने खड़ी है।
शरियत के हुक्म से वह एक मां का फर्ज आखिरी सांस तक निभाएगी। शबनम के दोनों भाई अकबर अली व अफसर अली की भी स्थिति इतनी बेहतर नहीं कि वह उसके परिवार को अपने घर में रख सकें। शबनम का कहना है कि परिस्थितियां चाहें जो भी रहें वह अपने बच्चों को लिए पति के सामने कभी गिड़गिड़ाएगी नहीं।