इसके बाद भी एक और विकल्प शबनम के पास होगा। इस विकल्प के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में रिव्यू पिटिशन भी दाखिल की जा सकती है। सुनील कहते हैं कि अगर इन कानूनी रास्तों को अख्तियार किया गया तब भी अगले कई महीनो का वक्त लग सकता है और शबनम को होने वाली फांसी टल सकती है। सुनील गुप्ता कहते हैं जिस तरीके से शबनम के वकीलों ने राज्यपाल और अब राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल की है। उससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कानून के बचे हुए सभी रास्तों को शबनम और उसके वकील अपनाएंगे।
महीनों लग सकते हैं प्रक्रिया में
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है अगर राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज की है तो 14 दिन की मोहलत मिलना जरूरी है। इसके अलावा दया खारिज करने पर उसको चुनौती देने का अधिकार भी है। कानून के जानकार कहते हैं इस पूरी प्रक्रिया में कुछ महीनों का वक्त भी लग सकता है।
निर्भया के दोषियों को फांसी दिए जाने की प्रक्रिया और शबनम को फांसी पर लटकाए जाने की प्रक्रिया में कानूनी दांव-पेच का खेल एकदम अलग है। तिहाड़ जेल के पूर्व लॉ ऑफिसर सुनील गुप्ता कहते हैं दरअसल निर्भया के दोषियों की संख्या ज्यादा थी। इसलिए उनके पास कानूनी दांव पेचों से खेलना और उसके आधार पर राहत मिलने का अधिकार ज्यादा बार मिलता था। चार लोगों में से किसी भी एक का मामला अगर कोर्ट में या राष्ट्रपति के पास विचाराधीन होता था तो सभी लोगों को राहत मिल जाती थी। दिसंबर 2012 में निर्भया कांड हुआ था और उसके करीब आठ साल बाद मार्च 2020 में दोषियों को फांसी दी गई थी। हालांकि शबनम के मामले में ऐसा नहीं है। शबनम को एक बार जरूर कानूनी दांवपेच का फायदा फांसी को कुछ दिनों तक आगे बढ़वाने के तौर पर मिल सकता है।