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Supreme Court Updates: राम मंदिर ट्रस्ट का नहीं होगा पुनर्गठन, निर्मोही अखाड़े की याचिका पर सुनवाई से इनकार

Mon, 17 Aug 2026 11:16 PM IST
प्रशांत तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

Supreme Court Updates: दो दिन की छुट्टी के बाद आज देश की सर्वोच्च अदालत फिर से खुली है। आज कोर्ट में कई अहम मुकदमों की सुनवाई है। ऐसे में सभी के अपडेट्स पढ़िए अमर उजाला पर...
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निर्मोही अखाड़े द्वारा दायर एक अलग याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में केंद्र सरकार से अयोध्या में राम मंदिर का प्रबंधन करने वाले श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को एक "सार्वजनिक ट्रस्ट" के रूप में पुनर्गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। निर्मोही अखाड़ा, भगवान राम को समर्पित एक प्राचीन रामानंद संप्रदाय का मठ है, जिसने अयोध्या राम जन्मभूमि कानूनी विवाद में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। यह मालिकाना हक विवाद में मुख्य वादी दलों में से एक था, जिसने राम लला और स्थल के प्रबंधन के अधिकार का दावा किया था।

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हाल ही में अखाड़े ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में बदलाव की मांग को लेकर शीर्ष अदालत का रुख किया था। इन मांगों में अधिक पारदर्शिता, सार्वजनिक ट्रस्ट का दर्जा और मंदिर प्रशासन में अपनी भूमिका शामिल थी। सोमवार को, मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व वी. मोहन की पीठ ने, दान चोरी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, अदालत द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) को राम मंदिर में कथित दान गबन की जांच को शीघ्रता से पूरा करने और उसे तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने का निर्देश दिया।

अखाड़े की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने निर्देश जारी करने की मांग की कि ट्रस्ट की मौजूदा संरचना और संरचना को "निजी ट्रस्ट" के रूप में घोषित किया जाए, जो राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में शीर्ष अदालत के नवंबर 2019 के फैसले की भावना और मंशा के अनुरूप नहीं है।

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 इस्कॉन बेंगलुरु मंदिर के समीक्षा याचिका के लिए नई पीठ पर SC करेगा विचार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बेंगलुरु स्थित हरे कृष्ण मंदिर के स्वामित्व से जुड़े विवाद में 16 मई 2025 के अपने फैसले की समीक्षा याचिका सुनने के लिए नई पीठ गठित करने के अनुरोध पर विचार करने की बात कही। यह अनुरोध इस्कॉन मुंबई की ओर से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष किया गया। वकील ने बताया कि समीक्षा याचिका पहले न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरश और बाद में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठों के समक्ष सूचीबद्ध हुई थी, लेकिन सुनवाई नहीं हो सकी।

16 मई 2025 को न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए बेंगलुरु के मंदिर और संबंधित संपत्ति को इस्कॉन बेंगलुरु का बताया था। उच्च न्यायालय ने पहले इस्कॉन मुंबई के पक्ष में फैसला दिया था। नवंबर 2025 में पुनर्विचार याचिका पर न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह की पीठ ने अलग-अलग राय दी। न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने पुनर्विचार का मामला मानते हुए याचिका को खुली अदालत में सुनने की अनुमति दी, जबकि न्यायमूर्ति मसीह ने अभिलेख पर स्पष्ट त्रुटि नहीं पाई और याचिका खारिज कर दी। मतभेद के चलते मामला आगे की कार्रवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया। यह विवाद 2011 से अदालत में लंबित है और मंदिर व शैक्षणिक परिसर के नियंत्रण को लेकर इस्कॉन बेंगलुरु तथा इस्कॉन मुंबई के बीच चल रहा है। इस्कॉन बेंगलुरु का कहना है कि वह कर्नाटक में पंजीकृत एक स्वतंत्र संस्था है और दशकों से मंदिर का संचालन कर रही है। वहीं, इस्कॉन मुंबई का दावा है कि बेंगलुरु की संस्था उसकी शाखा है और संबंधित संपत्ति पर उसका अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट में आप विधायक विशेष रवि के चुनाव को चुनौती देने वाली भाजपा नेता की याचिका पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता योगेंद्र चंदोलिया द्वारा आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक विशेष रवि के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की है। यह मामला दिल्ली की करोल बाग विधानसभा क्षेत्र से फरवरी 2020 में हुए चुनाव से संबंधित है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने विशेष रवि को चंदोलिया द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील पर नोटिस जारी किया है।

चंदोलिया की ओर से पेश वकील ने अदालत में कहा कि मामले में कानून का एक प्रश्न शामिल है। उन्होंने कहा, "क्या फॉर्म 26 में शैक्षिक योग्यता के बारे में की गई झूठी घोषणा, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(4) के दायरे में आती है?" उच्च न्यायालय ने 4 मई को चंदोलिया की याचिका को अप्रभावी मानते हुए निपटा दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि 2020 में चुनी गई विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया था और 2025 में नए चुनाव कराए गए थे।

2020 में दायर अपनी चुनाव याचिका में, चंदोलिया, जिन्हें भाजपा ने करोल बाग से रवि के खिलाफ मैदान में उतारा था, ने आरोप लगाया था कि आप विधायक की शैक्षणिक योग्यता उनके हलफनामे में गलत बताई गई थी। चंदोलिया ने आरोप लगाया था कि रवि का यह दावा कि उन्होंने 2003 में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के माध्यम से 10वीं कक्षा उत्तीर्ण की थी, झूठा था। उन्होंने इस आधार पर करोल बाग सीट के चुनाव परिणाम को अमान्य घोषित करने की प्रार्थना की थी।

दिसंबर 2020 में, उच्च न्यायालय ने रवि के इस दावे के आधार पर चुनाव याचिका को खारिज करने से इनकार कर दिया था कि यह कार्रवाई का कोई कारण नहीं बताता है। उच्च न्यायालय ने यह अवलोकन किया था कि चुनाव याचिका में ऐसे दावे थे जो यह प्रदर्शित करते थे कि आप विधायक "अपने द्वारा प्राप्त उच्चतम शैक्षिक योग्यता के संबंध में असंगत रुख अपना रहे हैं।" इसके बाद अदालत ने माना था कि किसी उम्मीदवार की शैक्षिक योग्यता के बारे में झूठी घोषणा, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भ्रष्ट आचरण के दायरे में लाई जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: राज्यों द्वारा हाथी गलियारों में बाधाएं खड़ी करना अस्वीकार्य
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को देशव्यापी सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया है ताकि यह जांच की जा सके कि क्या किसी राज्य ने हाथी गलियारों में बाधाएं या अवरोध पैदा किए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई भी कार्रवाई अस्वीकार्य है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि राज्य हाथियों के रास्ते में बाधाएं नहीं बना सकते, भले ही इसका उद्देश्य फसलों के नुकसान या आजीविका को बचाना हो।

पीठ ने कहा, "किसी भी प्रकार की बाधा का निर्माण या हाथी गलियारों में अवरोध पैदा करना स्वीकार्य नहीं है। हम स्पष्ट हैं कि वन्यजीवों के रास्ते में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। हाथियों के झुंड लंबी दूरी तय करने के अभ्यस्त होते हैं। कोई भी राज्य यह नहीं कह सकता कि केवल इसलिए कि फसलें नष्ट हो रही हैं, उन्हें उनके रास्ते में बाधाएं बनानी होंगी।"

न्यायमूर्ति बागची ने पश्चिम बंगाल में आग के गोलों और नुकीले कांटों के इस्तेमाल की प्रथा का जिक्र किया, जो तब प्रचलित होती है जब हाथी नेपाल से आकर पश्चिम बंगाल से झारखंड और अन्य राज्यों की ओर जाते हैं। मुख्य न्यायाधीश कांत ने हरियाणा के यमुनानगर क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी हाथी हैं और वे वहां से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की ओर जाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, "कोई भी राज्य उनके रास्ते को अवरुद्ध नहीं कर सकता।"

शीर्ष अदालत ने हाथियों को भगाने के लिए किसी भी प्रकार के आग के गोलों या मशालों के उपयोग पर रोक लगा दी है और राज्य के अधिकारियों से इन निर्देशों को लागू करने को कहा है। केंद्र को छह सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए, पीठ ने कहा कि मंत्रालय द्वारा पहले से ही अनिवार्य दिशानिर्देश जारी किए गए हैं ताकि विभिन्न राज्यों से गुजरने वाले हाथी गलियारों को निर्बाध और सुगम बनाया जा सके।

एसआईआर में 2002 आधार वर्ष बरकरार : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सिक्किम में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के लिए 2002 को आधार वर्ष रखने के निर्वाचन आयोग के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने ‘सिक्किमीज मूलनिवासी सुरक्षा संघ’ की याचिका खारिज कर दी।

याचिकाकर्ता ने क्या मांग की थी?
 याचिकाकर्ता संगठन ने मांग की थी कि SIR के लिए 2002 के बजाय 1993 को आधार वर्ष बनाया जाए। संगठन का तर्क था कि 2002 में मतदाता सूची में जोड़े गए मतदाताओं का आंकड़ा सिक्किम के जनसांख्यिकीय आंकड़ों से मेल नहीं खाता और इससे मतदाता सूची में और विसंगतियां पैदा हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों हस्तक्षेप से किया इंकार?
पीठ ने कहा कि पूरी प्रक्रिया के बीच में नियम या आधार वर्ष नहीं बदला जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर में SIR के लिए 2002 को आधार वर्ष रखा गया है, क्योंकि उस वर्ष अंतिम SIR हुआ था। पीठ ने यह भी कहा कि 2002 की मतदाता सूची में शामिल मतदाताओं ने इसके बाद हुए चुनावों में मतदान किया है। अदालत ने कहा कि सिक्किम जैसे सीमावर्ती राज्यों में प्रवासन और जनसांख्यिकीय बदलाव की समस्या रहती है, लेकिन केवल इस आधार पर ECI के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

CJI ने खारिज की याचिका  
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संगठन की याचिका के आधार पर निर्वाचन आयोग के फैसले में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को सिक्किम के लिए उचित छूट देने के संबंध में निर्वाचन आयोग से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी। इसके बाद पीठ ने याचिका खारिज कर दी।

'ट्रांसजेंडर पहचान पत्र नए कानून पर फैसले तक मान्य रहेंगे', सुप्रीम कोर्ट से बोला केंद्र
केंद्र सरकार ने सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 के लागू होने से पहले जारी किए गए ट्रांसजेंडर पहचान पत्र मान्य बने रहेंगे और नए कानून से प्रभावित नहीं होंगे। ट्रांसजेंडर पहचान पत्र (TGI) व्यक्ति की स्वयं-पहचाने गए लिंग की आधिकारिक मान्यता प्रदान करता है और इसका उपयोग आधिकारिक रिकॉर्ड में नाम और लिंग परिवर्तन का समर्थन करने के लिए किया जा सकता है। सरकार के ट्रांसजेंडर पोर्टल पर विशेष रूप से कहा गया है कि यह आधिकारिक दस्तावेजों में नाम और लिंग परिवर्तन को सक्षम बनाता है।

सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से सवाल- परमाणु हादसे में क्या अदालतें उचित मुआवजा देने से रोकी गई हैं? 
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र से स्पष्ट करने को कहा कि परमाणु हादसे की स्थिति में क्या अदालतों को शांति कानून के तहत उचित और न्यायसंगत मुआवजा तय करने से रोका गया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि उसे दो पहलुओं पर स्पष्टीकरण चाहिए। पहला, क्या संवैधानिक अदालतों की उचित और न्यायसंगत मुआवजा तय करने की शक्ति पर कोई रोक है और दूसरा, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति से संबंधित कानून की धारा 17(4) का क्या प्रभाव है।

पीठ ने सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि शांति (भारत को बदलने के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास) कानून के तहत नियामक संस्था में सदस्यों की नियुक्ति में हितों का कोई टकराव तो नहीं है। शीर्ष अदालत पूर्व नौकरशाह ईएएस शर्मा के नेतृत्व में प्रोफेसरों और वैज्ञानिकों सहित याचिकाकर्ताओं के एक समूह की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया है कि 2025 का यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

समूह की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण और नेहा राठी ने कहा कि कानून किसी हादसे की स्थिति में देनदारी की सीमा तय करता है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि बहुत अधिक आशंका जताई जा रही है। उन्होंने कहा कि भले ही संसद ने परमाणु संयंत्रों के संचालकों की देनदारी की सीमा तय की हो, लेकिन इससे अदालत को उचित और न्यायसंगत मुआवजा देने से नहीं रोका जा सकता।

उन्होंने कहा कि संसद ने परियोजना शुरू करने वालों को प्रोत्साहित करने और निवेश लाने के लिए विधेयक पारित किया है। भूषण ने कहा कि यह संचालकों को सुरक्षा में लापरवाही बरतने की अनुमति देने जैसा है। पीठ ने केंद्र से शांति कानून की धारा 17(4) के तहत परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति के संबंध में भी अपना रुख स्पष्ट करने को कहा। इन सदस्यों की नियुक्ति परमाणु ऊर्जा आयोग की ओर से गठित खोज और चयन पैनल की सिफारिश पर की जाती है।

'1953 में पुलिस थाने के लिए जबरन ली गई जमीन का दें मुआवजा', सुप्रीम कोर्ट का जम्मू-कश्मीर प्रशासन को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जम्मू-कश्मीर प्रशासन से कहा कि वह उन किसानों के वंशजों में से एक को मुआवजा और किराया दे, जिनकी जमीन 73 साल से अधिक समय पहले बिना अधिग्रहण प्रक्रिया के कंगन में पुलिस थाना बनाने के लिए जबरन ले ली गई थी।  गांदरबल के कंगन में सात कनाल और 18 मरला जमीन 1953 में पुलिस थाना बनाने के लिए जबरन ले ली गई थी। जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया था और इसके लिए कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अब्दुल राशिद वानी की याचिका पर सुनवाई की। वानी ने अधिवक्ता महफूज अहसन नाजकी के जरिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उन्होंने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के 2022 के फैसले को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने 1953 में गांदरबल जिले में पुलिस थाना बनाने के लिए ली गई जमीन का कब्जा वापस दिलाने की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि दावा 68 साल की अत्यधिक और बिना उचित कारण बताई गई देरी से प्रभावित है।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने वानी की इस दलील पर विचार किया कि भले ही मामले में देरी हुई हो, लेकिन राज्य की गैरकानूनी कार्रवाई के कारण उन्हें नुकसान नहीं उठाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि करीब सात दशक की देरी के कारण वह आज की तारीख से नए सिरे से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश नहीं दे सकती। हालांकि, पीठ ने कहा कि वह भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश देगी कि वह 2021 में वानी के उच्च न्यायालय का रुख करने की तारीख से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करे। पीठ ने वानी को राहत देते हुए भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश दिया कि वह 1953 से उस जमीन का किराया तय करे, जब उसे पुलिस थाना बनाने के लिए जबरन कब्जे में लिया गया था।

त्वरित सुनवाई का अधिकार पीड़ित का भी 'महत्वपूर्ण अधिकार': सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि मुकदमे की जल्द सुनवाई का अधिकार केवल आरोपी का ही नहीं, बल्कि पीड़ित का भी महत्वपूर्ण अधिकार है। शीर्ष अदालत ने हत्या के एक मामले में सुनवाई पर रोक लगाने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। उच्च न्यायालय ने पिछले साल अगस्त में दिए अपने आदेश में सुनवाई को रोकने के साथ विशेष न्यायाधीश को उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत दर्ज मामले की कार्यवाही में तेजी लाने का निर्देश दिया था। यह निर्देश कानून की धारा 12 के अनिवार्य प्रावधानों के उद्देश्य को पूरा करने के लिए दिया गया था। गैंगस्टर्स अधिनियम की धारा 12 विशेष अदालतों में मुकदमे की सुनवाई को प्राथमिकता देने से संबंधित है।

उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून की धारा 12 का उद्देश्य यह नहीं था कि गैंगस्टर्स अधिनियम के तहत कार्यवाही पूरी होने तक आरोपी के खिलाफ अन्य मामलों की सुनवाई रोक दी जाए।  न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पाली की पीठ ने कहा, "इसका उद्देश्य केवल यह बताना था कि तारीखों के टकराव की स्थिति में गैंगस्टर्स अधिनियम के तहत कार्यवाही को प्राथमिकता दी जाएगी।" पीठ ने कहा कि इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। संविधान का अनुच्छेद 21 त्वरित सुनवाई के अधिकार की गारंटी देता है।

पीठ ने कहा, "इस अदालत ने कहा है कि त्वरित सुनवाई का अधिकार केवल आरोपी का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि पीड़ित का भी महत्वपूर्ण अधिकार है और मुकदमे के निष्कर्ष में किसी भी अत्यधिक देरी का समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।" शीर्ष अदालत ने कहा कि 13 अप्रैल को उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते समय उसने ललितपुर की निचली अदालत को हत्या के मामले की सुनवाई जारी रखने और दो महीने के भीतर इसे पूरा करने का निर्देश दिया था।

नियामक संस्था उसी संस्थान को नहीं चला सकती, जिसकी वह निगरानी करती है: सुप्रीम कोर्ट में दलील
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को दलील दी गई कि कोई नियामक संस्था उस संस्थान को खुद संचालित नहीं कर सकती, जिसकी निगरानी और नियमन की जिम्मेदारी उसी के पास हो। परमाणु हादसे की स्थिति में शांति कानून के तहत उचित और न्यायसंगत मुआवजे से जुड़े मामले में दलीलें रखते हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ से कहा कि वह भारतीय बार काउंसिल के एक लॉ कॉलेज चलाने के खिलाफ याचिका दाखिल करेंगे। उन्होंने कहा कि BCI लॉ कॉलेजों की नियामक संस्था है, इसके बावजूद वह खुद एक लॉ कॉलेज चला रही है।

भूषण ने कहा, "यह दाखिल करने की प्रक्रिया में है।" इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ईएएस शर्मा की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें सतत दोहन और भारत को बदलने के लिए परमाणु ऊर्जा के विकास कानून की वैधता को चुनौती दी गई है।
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सुप्रीम कोर्ट ने आप की गुजरात इकाई के फेसबुक, इंस्टाग्राम अकाउंट बहाल करने का दिया निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आम आदमी पार्टी (आप) की गुजरात इकाई के फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट बहाल करने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अलोक आराधे की पीठ ने आप गुजरात की ओर से दायर अंतरिम आवेदन पर यह आदेश दिया। आवेदन में पार्टी के फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट बहाल करने की मांग की गई थी। आप की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत तथा अधिवक्ता सिद्धांत शर्मा और तल्हा अब्दुल रहमान पेश हुए।

शीर्ष अदालत ने आवेदन को स्वीकार करते हुए कहा कि यदि अकाउंट पर कोई आपत्तिजनक पोस्ट है तो उसे हटाना होगा। पीठ ने मुख्य मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद के लिए तय की। 14 जुलाई को शीर्ष अदालत ने आप गुजरात की उस याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा था, जिसमें पार्टी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट और वेब पोर्टल को निलंबित किए जाने को चुनौती दी थी।

पार्टी ने दलील दी थी कि अधिकारियों ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) का इस्तेमाल किया, लेकिन यह प्रावधान लागू नहीं होता क्योंकि यह मध्यस्थ के लिए सुरक्षित आश्रय यानी सेफ हार्बर से जुड़ा प्रावधान है। याचिका में पार्टी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट को ब्लॉक और निलंबित करने के कानूनी आधार पर सवाल उठाया था। साथ ही यह घोषित करने की मांग की थी कि धारा 79(3)(बी) अधिकारियों को सूचना ब्लॉक करने का निर्देश देने का अधिकार देने वाला प्रावधान नहीं है।

याचिका में यह भी मांग की गई थी कि इस प्रावधान के तहत जारी सभी संबंधित निर्देशों, नियमों और अधिसूचनाओं को, जहां तक वे सूचना को ब्लॉक करने से जुड़े हैं, अमान्य घोषित किया जाए। आप ने कानून प्रवर्तन अधिकारियों की ओर से उसके सोशल मीडिया अकाउंट को ब्लॉक या निलंबित करने के लिए कथित तौर पर जारी निर्देशों को रद्द करने की भी मांग की थी।
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