रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में शुष्क क्षेत्रों का विस्तार लगभग 43 लाख वर्ग किमी बढ़ा है। यह क्षेत्र भारत के आकार से लगभग एक-तिहाई बड़ा है। रिपोर्ट चेताती है कि अगर आने वाले वक्त में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगी तो दुनिया के तीन फीसदी नमी वाले इलाके इस सदी के खत्म होते-होते शुष्क भूमि में तब्दील हो जाएंगे।
धरती के 77 फीसदी से ज्यादा हिस्सों की जलवायु बीते 30 वर्षों में अधिक शुष्क हो गई है। इस दौरान दुनिया में शुष्क क्षेत्रों में भी बढ़ोतरी हुई है। धरती का 40 फीसदी से अधिक हिस्सा सूखी जमीन में तब्दील हो चुका है। सऊदी अरब के रियाद में 16वें संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन (यूएनसीसीडी) में सोमवार को जारी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
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रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में शुष्क क्षेत्रों का विस्तार लगभग 43 लाख वर्ग किमी बढ़ा है। यह क्षेत्र भारत के आकार से लगभग एक-तिहाई बड़ा है। रिपोर्ट चेताती है कि अगर आने वाले वक्त में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगी तो दुनिया के तीन फीसदी नमी वाले इलाके इस सदी के खत्म होते-होते शुष्क भूमि में तब्दील हो जाएंगे।
यूरोप, अमेरिका पर सबसे ज्यादा प्रभाव
सूखे से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में यूरोप का 96 फीसदी, पश्चिमी अमेरिका, ब्राजील, एशिया और मध्य अफ्रीका के हिस्से शामिल हैं। दक्षिण सूडान और तंजानिया में भूमि का सबसे बड़ा हिस्सा शुष्क क्षेत्र में बदला है, जबकि चीन में सबसे बड़ी भूमि क्षेत्र शुष्क हो चुकी है। शुष्क क्षेत्रों में रहने वाले लगभग आधे लोग एशिया और अफ्रीका में रहते हैं। सबसे अधिक जनसंख्या वाले शुष्क क्षेत्रों में कैलिफोर्निया, मिस्र, भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्से और उत्तर-पूर्वी चीन शामिल हैं।
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05 अरब लोगों के सामने संकट
बीते तीन दशकों के दौरान शुष्क क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आबादी दोगुनी होकर 2.3 अरब तक जा पहुंची है। सबसे खराब जलवायु परिवर्तन के हालात में यह संख्या 2100 तक पांच अरब तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन अरबों लोगों को जलवायु परिवर्तन के कारण शुष्कता और मरुस्थलीकरण में बढ़ोतरी की वजह से अपने जीवन और आजीविका के लिए गंभीर खतरे झेलने पड़ेंगे।
जलवायु में स्थायी बदलाव को पलटना मुश्किल
यूएनसीसीडी के कार्यकारी सचिव इब्राहीम थियाव ने कहा कि पहली बार शुष्कता संकट को वैज्ञानिक स्पष्टता के साथ बताया गया है, जिससे दुनियाभर में अरबों लोगों को प्रभावित करने वाले अस्तित्व से जुड़े खतरे का पता चलता है। यह समस्या अस्थायी सूखे जैसी नहीं है, जो कुछ समय बाद खत्म हो जाती है।
शुष्कता स्थायी बदलाव है। सूखा खत्म हो सकता है, लेकिन जलवायु में जो स्थायी बदलाव हो रहे हैं, उन्हें पलटा नहीं जा सकता।