फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Sedition Law: राजद्रोह कानून पर यू-टर्न लेने के लिए क्यों मजबूर हुई सरकार? क्या उसे सुप्रीम कोर्ट में मिल सकती थी पटखनी!

अमित शर्मा
Updated Wed, 11 May 2022 02:03 PM IST

सार

सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय राजद्रोह कानून के मामले में बेहद कड़े रुख के साथ आगे बढ़ता दिख रहा था। जिस तरह से इस कानून का लगातार दुरुपयोग हो रहा है, लोग जमानत के लिए बार-बार सर्वोच्च न्यायालय के पास आ रहे हैं, लोग उससे इस कानून की उचित व्याख्या करने की मांग कर रहे थे...
विज्ञापन
विज्ञापन
कानून - फोटो : Agency (File Photo)


माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के रुख से केंद्र सरकार को इस बात का आभास हो गया था कि सर्वोच्च न्यायालय इस कानून को समाप्त करने की तरफ बढ़ सकता है। केंद्र की पहले की स्थिति और उसके द्वारा अब तक लगाए गए राजद्रोह के अनेक मामलों के कारण अदालत का यह संभावित फैसला उसकी साख को नुकसान पहुंचा सकता था। यही कारण है कि सरकार के कानूनी मामलों के सलाहकारों ने सरकार से राजद्रोह कानून में उचित बदलाव करने का सुझाव दिया, जिस पर सरकार सहमत हो गई।


इससे सरकार की मंशा पूरी करने का रास्ता भी बन जाता है, तो साथ ही कानून के दुरुपयोग को रोककर वह इसे अपने द्वारा किया गया एक प्रगतिशील निर्णय बताकर अपनी वाह-वाही भी लूट सकती है। चूंकि केंद्र सरकार इसके पहले भी सैकड़ों कानूनों को पुराना और अनुपयोगी बताकर खत्म करने की प्रक्रिया पूरी कर चुकी है, केंद्र का यह कदम उसकी पूर्व की नीति से जोड़ कर देखा जा रहा है।

साख बचाने की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय राजद्रोह कानून के मामले में बेहद कड़े रुख के साथ आगे बढ़ता दिख रहा था। जिस तरह से इस कानून का लगातार दुरुपयोग हो रहा है, लोग जमानत के लिए बार-बार सर्वोच्च न्यायालय के पास आ रहे हैं, लोग उससे इस कानून की उचित व्याख्या करने की मांग कर रहे थे। देश में इस कानून को समाप्त करने की मांग भी बढ़ती जा रही थी। इस कानून को बनाने वाले इंग्लैंड ने खुद अपने ही देश में इस कानून को खत्म कर दिया है, लिहाजा इस कानून को समाप्त करने के अभियान को एक नैतिक समर्थन मिलता दिख रहा था।  


अश्विनी कुमार दुबे के मुताबिक, संविधान का संरक्षक होने के नाते सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर चुप नहीं बैठ सकता था और उसे अपने निर्णय से इस बेहद संवेदनशील मामले में देश को एक राह दिखानी थी। माना जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय इस कानून पर कड़ी आपत्ति जाहिर करते हुए इसे खत्म कराने की पहल कर सकता था। केंद्र सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के इस कड़े रुख का अनुमान हो गया था, लिहाजा उसने समय रहते अपनी साख बचाने के लिए अपने स्टैंड में परिवर्तन कर लिया।  

कांग्रेस ने किया था कानून खत्म करने का वादा

ध्यान देने की बात है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इस बात का वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आती है तो राजद्रोह कानून को खत्म करेगी। राहुल गांधी की टीम का यह नीतिगत फैसला उन मामलों के आलोक में लिया गया बताया जाता है, जिसमें केंद्र सरकार ने अनेक सामाजिक अधिकार कार्यकर्ताओं को राजद्रोह कानून में जेलों में ठूंस दिया गया था। ऐसे अनेक कार्यकर्ता लंबे समय से जेल में थे और उन्हें उनका अपराध तक नहीं बताया गया था। कांग्रेस के इस फैसले से उसे पढ़े-लिखे युवा वर्गों के साथ-साथ आदिवासी इलाकों में सफलता मिल सकती थी।



कांग्रेस की रणनीति देखते हुए भाजपा ने उस पर करारा हमला किया और उसे ‘राष्ट्रद्रोहियों का समर्थक’ तक करार दिया था। कांग्रेस का विरोध करने के लिए कुछ विवादित लोगों के उसके साथ संबंध भी बताए जाने लगे। ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि यदि सरकार इस कानून में बड़ा फेरबदल करती है तो भाजपा उसका किस प्रकार बचाव करती है।

खतरों से कैसे निपटेगी सरकार

लेकिन भारत जैसे विशाल देश में आंतरिक अशांति फैलने का खतरा बना रहता है। कुछ पड़ोसी देशों की हरकतों से भी उसकी शांति को भंग किए जाने का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। लिहाजा वह ऐसी किसी गतिविधियों से निपटने के लिए कोई कड़ा कानून सदैव अपने पास रखना चाहेगा।



संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि यूएपीए कानून के रूप में सरकार के पास इस तरह की देशविरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए बड़ा हथियार पहले से मौजूद है। लेकिन इसके बाद भी वह वर्तमान राजद्रोह कानून में उपयुक्त संशोधन करने का रास्ता तलाश सकती है। यदि राजद्रोह कानून समाप्त किया जाता है, तो इन परिस्थितियों से निपटने के लिए केंद्र किसी नए कानून को लाने की पहल भी कर सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next