फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

SC: 'धर्मनिरपेक्षता व्यावहारिक हो, कागजों तक सीमित न रहे', महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर 'सुप्रीम' टिप्पणी

Sat, 08 Nov 2025 07:02 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

न्यायाधीश संजय कुमार ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का पालन व्यावहारिक रूप से होना चाहिए, केवल दस्तावेजों में नहीं। यह टिप्पणी महाराष्ट्र सरकार की उस याचिका पर आई, जिसमें अकोला दंगों की जांच के लिए हिंदू-मुस्लिम अफसरों वाली एसआईटी गठित करने के आदेश की समीक्षा मांगी गई थी।

विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का व्यावहारिक रूप से पालन किया जाना चाहिए। इसे केवल कागजों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस कुमार की टिप्पणी महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के उस खंडित फैसले का हिस्सा है, जिसमें 2023 के अकोला दंगों की जांच के लिए एसआईटी गठित करने संबंधित 11 सितंबर के शीर्ष आदेश की समीक्षा की मांग की गई थी।
विज्ञापन

शीर्ष कोर्ट ने अकोला दंगों के दौरान एक हमले की जांच में महाराष्ट्र पुलिस की विफलता की आलोचना करते हुए विशेष जांच दल गठित करने का आदेश दिया था।

शीर्ष कोर्ट ने इस एसआईटी में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों से वरिष्ठ अधिकारी शामिल करने के लिए कहा था। राज्य सरकार ने इस आदेश की समीक्षा के लिए यह याचिका दायर की थी। राज्य सरकार का दावा था कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के अधिकारियों वाली एक एसआईटी के गठन का निर्देश, भले ही नेकनीयती से दिया गया हो लेकिन यह संस्थागत धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन करता है, जिसकी पुष्टि न्यायालय ने संविधान के मूल ढांचे के एक भाग के रूप में बार-बार की है।

क्या था महाराष्ट्र सरकार का तर्क?
राज्य सरकार का तर्क था कि यह निर्देश लोक सेवकों के अंदर सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को पूर्वधारणा देने जैसा है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद शर्मा की पीठ ने इस समीक्षा याचिका पर खंडित फैसला सुनाया। जस्टिस कुमार को 11 सितंबर के फैसले पर पुनर्विचार को कोई आधार नहीं दिखा वहीं जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि पुनर्विचार की मांग इस सीमा तक की गई थी कि विशेष जांच दल में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के अधिकारी शामिल करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस शर्मा ने खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति दी और याचिका पर नोटिस जारी किया।
विज्ञापन


पुलिस ने की कर्तव्य की उपेक्षा
11 सितंबर के आदेश का हवाला देते हुए जस्टिस कुमार ने कहा कि तथ्यों से स्पष्ट है कि संज्ञेय अपराध होने की सूचना दिए जाने के बावजूद न तो संबंधित थाने के अधिकारियों और न ही पुलिस अधीक्षक ने कम से कम प्राथमिकी दर्ज करके आवश्यक कार्रवाई की, जो स्पष्ट रूप से उनकी ओर से कर्तव्य की पूर्ण उपेक्षा को दर्शाता है, चाहे वह जानबूझकर की गई हो या घोर लापरवाही के कारण।

यह था मामला
मई, 2023 में महाराष्ट्र के अकोला में पैगंबर मोहम्मद पर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट के बाद दंगे हुए। इसमें विलास महादेवराव गायकवाड़ नामक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। प्रतिवादी मो.अफजल (तब 17 वर्षीय) घायल हो गया। प्रतिवादी के अनुसार, उसने चार लोगों को गायकवाड़ पर तलवार, लोहे के पाइप व अन्य वस्तुओं से हमला करते देखा। हमलावरों ने उस पर भी हमला किया और उसका वाहन जला दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें