प्रो. हैनी बाबू
- फोटो : फाइल
मुंबई की एक विशेष एनआईए अदालत ने एल्गार परिषद माओमादी संबंध मामले में गिरफ्तार किए गए दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के प्रोफेसर बाबू हैनी बाबू की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि प्रतिबंधित आतंकी संगठन सीपीआई (माओवादी) की गतिविधियों को बढ़ाने में पृथम दृष्टया प्रो. बाबू की संलिप्तता प्रदर्शित होती है, जो कि 'मोदी राज' को समाप्त करने पर आमादा है।
एनआईए के मामलों की सुनवाई के लिए नियुक्त किए गए विशेष न्यायाधीश डीई कोठालिकर ने 14 फरवरी को हैनी बाबू की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इस संबंध में विस्तृत आदेश सोमवार को उपलब्ध हुआ। विशेष अदालत ने अपने फैसले में एक पत्र का उल्लेख किया जिसमें एनआईए ने आरोप लगाया है कि सह आरोपी रोना मिल्सन और प्रकाश नामक एक व्यक्ति के बीच आदान-प्रदान हुआ था।
अदालत ने कहा कि पत्र की सामग्री से प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि सीपीआई (माओवादी) 'मोदी राज' यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को समाप्त करने पर आमादा थी। इतना ही नहीं वह प्रधानमंत्री मोदी के रोडशो को निशाना बनाकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मौत जैसी एक और घटना को अंजाम देने के बारे में विचार कर रहे थे।
सीपीआई सदस्य की रिहाई के लिए बांटे गए पर्चों में था बाबू का नंबर
विशेष न्यायाधीश कोठालिकर ने कहा कि यदि उचित परिप्रेक्ष्य में आरोपों पर विचार किया जाए तो प्रथम दृष्टया यह निष्कर्ष निकालने में कोई झिझक नहीं होगी कि अभियुक्तों ने भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा और संप्रभुता को खतरे में डालने के लिए कार्य किया है। अदालत ने कहा कि यह ध्यान देने योग्य है कि प्रतिबंधित संगठन के सदस्य जीएन साईबाबा की रिहाई के लिए बांटे गए पर्चों में बाबू का मोबाइल नंबर था।
आदेश के अनुसार, यह प्रथम दृष्टया यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि सीपीआई (माओवादी) की गतिविधियों को बढ़ाने में आवेदक की संलिप्तता थी।