कानून में संशोधन कर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले में रहने की इजाजत देने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है जिसे शीर्ष अदालत ने निर्णायक सुनवाई के लिए सोमवार को स्वीकार कर लिया। न्यायमूर्ति न्यायाधीश रंजन गोगोई और एमएम शांतानागुडर की पीठ ने जनहित याचिका का जवाब देने के लिए राज्य सरकार को तीन हफ्ते का वक्त दिया और मामले की सुनवाई 23 अगस्त तय कर दी।
उत्तर प्रदेश के एनजीओ लोक प्रहरी ने पीआईएल दायर करते हुए उत्तर प्रदेश मंत्रियों (वेतन, भत्ते और अन्य प्रावधान) अधिनियम, 1981 में तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार द्वारा किए गए संशोधन को चुनौती दी थी। याचिका में पिछले साल ही यूपी सरकार द्वारा पारित एक और अधिनियम को भी चुनौती दी गई है। यह अधिनियम न्यासियों, पत्रकारों, राजनीतिक दलों, विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, न्यायिक अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों को सरकारी आवास देने से संबंधित कानून में संशोधन से जुड़ा है।
कानून में संशोधन से प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह यादव और मायावती को सरकारी बंगलों में बने रहने की इजाजत है। एनजीओ के महासचिव एसएन शुक्ला ने याचिका में दावा किया है कि राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत के 1 अगस्त 2016 के फैसले की अनदेखी करते हुए इस विधेयक में संशोधन किया है। इसके बाद ही शीर्ष अदालत ने इस मामले में 15 अगस्त 2016 को यूपी सरकार का जवाब मांगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगलों का आवंटन एक गलत कानून है और उन्हें दो महीने के अंदर बंगले खाली कर देना चाहिए। फैसले में राज्य सरकार से भी कहा गया था कि जितने समय तक वे अनधिकृत तरीके से उन बंगलों पर काबिज रहे, उतने समय का उनसे उपयुक्त किराया वसूला जाना चाहिए। राज्य सरकार का कानून किसी तरह के औचित्य के बिना पूर्व मुख्यमंत्रियों के प्रति उदारता को दर्शाता है।