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Supreme Court Updates: कार्यवाहक DGP की नियुक्ति पर कोर्ट ने सरकार मांगा जवाब, तीन हफ्ते का दिया अल्टीमेटम

Sat, 08 Nov 2025 12:13 AM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तमिलनाडु सरकार से यह बताने को कहा कि उसने नियमित पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति के बजाय कार्यवाहक डीजीपी क्यों नियुक्त किया। अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों का पालन न करने और कथित अवमानना से जुड़ा है।

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मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह आदेश उस समय दिया जब याचिकाकर्ता किशोर कृष्णस्वामी की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 8 सितंबर के आदेश की अवहेलना की है। उस आदेश में कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा सुझाए गए नामों में से तुरंत एक नियमित डीजीपी नियुक्त करे।

कोर्ट में याचिकाकर्ता के आरोप
भूषण ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने 29 अगस्त को यूपीएससी को नामों की सूची दी थी और फिर 31 अगस्त को आईपीएस अधिकारी जी. वेंकटरमण को कार्यवाहक डीजीपी बना दिया गया। उन्होंने कहा कि यह नियुक्ति कोर्ट के स्पष्ट आदेशों का सीधा उल्लंघन है। याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार (2006 और 2018) मामलों में स्पष्ट किया गया था कि कार्यवाहक डीजीपी जैसी कोई अवधारणा कानून में नहीं है। इसके बावजूद राज्य ने जानबूझकर आदेशों की अनदेखी की है।
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राजनीतिक पक्षपात के आरोप
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि मौजूदा कार्यवाहक डीजीपी को राजनीतिक लाभ के लिए चुना गया है। याचिका में कहा गया कि यह अधिकारी सरकार के “राजनीतिक हितों की रक्षा” के लिए काम कर रहा है और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निष्पक्ष रूप से नहीं निभा रहा। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव मई 2026 में होने वाले हैं, और इससे पहले सरकार पुलिस बल के शीर्ष पद पर अपने “मनपसंद व्यक्ति” को बनाए रखना चाहती है।

सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर तमिलनाडु सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है और कहा है कि राज्य यह बताए कि उसने अब तक नियमित डीजीपी की नियुक्ति क्यों नहीं की। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि इस तरह के मामले पहले भी झारखंड जैसे राज्यों में आए हैं, लेकिन कोर्ट ने तब कहा था कि अवमानना का दायरा राजनीतिक मतभेद निपटाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। अब अदालत यह तय करेगी कि तमिलनाडु सरकार ने जानबूझकर आदेश की अवहेलना की या नहीं।


जोजड़ी नदी प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राजस्थान सरकार से पूछा- सफाई आदेश के खिलाफ अपील क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राजस्थान सरकार से सख्त सवाल पूछा कि राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम ने जोजड़ी नदी की सफाई से जुड़े नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ अपील क्यों की है। अदालत ने कहा कि जब आदेश प्रदूषण हटाने के लिए है, तब राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम को इसका विरोध करने की जरूरत क्यों पड़ी। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की है।

दरअसल, एनजीटी ने फरवरी 2022 में जोजड़ी नदी में हो रहे औद्योगिक प्रदूषण को लेकर आदेश जारी किया था। यह मामला लूणी, बांदी और जोजड़ी नदियों में रासायनिक और औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ने से जुड़ा है। एनजीटी ने प्रदूषण फैलाने वाले संस्थानों और निकायों पर जुर्माना लगाया था, जिसमें राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम से 2 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा वसूलने का निर्देश दिया गया था। इसी आदेश के खिलाफराज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम और कुछ नगर निकायों ने अपील की थी।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम की अपील का कोई औचित्य नहीं बनता, क्योंकि यह आदेश नदी को साफ करने से जुड़ा है। अदालत ने पूछा, 'राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम सफाई के खिलाफ क्यों है? ये तो पर्यावरण की रक्षा से जुड़ा आदेश है।' अदालत ने राजस्थान सरकार के वकील से पूछा कि क्या राज्य के सभी संबंधित निकाय अब भी इन अपीलों को जारी रखना चाहते हैं।
 

सुप्रीम कोर्ट ने अमित जोगी के बरी होने पर सीबीआई की अपील बहाल करने का दिया आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सीबीआई की उस याचिका को मंजूरी दे दी, जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा अमित जोगी की बरी के खिलाफ एजेंसी की अपील को खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। यह मामला 2003 में कांग्रेस नेता रामअवतार जागी की हत्या से जुड़ा है, जिसमें 28 अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया गया था।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि न्याय के हित में सीबीआई की विलंबित अपील स्वीकार की जाती है। अदालत ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट सीबीआई की याचिका पर तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि उसके गुण-दोष के आधार पर पुनः विचार करे, ताकि निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: बलात्कार पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए सेशन कोर्ट और पॉक्सो अदालतें खुद आदेश दें
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की सेशन और पॉक्सो अदालतों को निर्देश दिया है कि वे बलात्कार और यौन उत्पीड़न की पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए खुद आदेश पारित करें। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना और आर. महादेवन की पीठ ने यह निर्देश एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें दावा किया गया था कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण पीड़ितों को वैधानिक मुआवजा नहीं मिल पा रहा। अदालत ने कहा कि कई बार अदालतों के स्पष्ट निर्देश नहीं होने के कारण पीड़ितों को खुद कानूनी सेवाओं प्राधिकरण के पास आवेदन करना पड़ता है, जिससे उन्हें समय पर राहत नहीं मिलती। कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को आदेश भेजने को कहा ताकि यह निर्देश विशेष अदालतों तक पहुंचे और न्यायिक प्रशिक्षण में भी मुआवजा प्रक्रिया की जानकारी दी जाए।

सार्वजनिक निविदा कोई निजी सौदा नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक निविदा कोई निजी सौदा नहीं होती, बल्कि यह शासन का एक उपकरण है जिसके माध्यम से राज्य सार्वजनिक संपत्ति का पारदर्शी और निष्पक्ष उपयोग सुनिश्चित करता है। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आलोक आराध्य की पीठ ने यह टिप्पणी ओडिशा के कटक जिले में महानदी सैंड क्वारी की निविदा विवाद पर सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि निविदा की गलत व्याख्या से प्रतिस्पर्धा घटती है और राज्य के राजस्व को नुकसान होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी निविदा की शर्तों की गलत व्याख्या या मनमानी सार्वजनिक हित को प्रभावित करती है, तो अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए। अदालत ने कहा कि निविदा का उद्देश्य राज्य के राजस्व को अधिकतम करना और प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखना है।

अकोला दंगे पर सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला, हिंदू-मुस्लिम अफसरों वाली SIT पर मतभेद
अकोला दंगे की जांच को लेकर महाराष्ट्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को विभाजित फैसला सुनाया। अदालत ने पहले दिए गए उस आदेश की समीक्षा करने से इंकार कर दिया, जिसमें अकोला में 2023 में हुए सांप्रदायिक दंगों की जांच के लिए हिंदू और मुस्लिम समुदायों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक संयुक्त विशेष जांच टीम (एसआईटी) गठित करने के निर्देश दिए गए थे। न्यायमूर्ति संजय कुमार, जिन्होंने 11 सितंबर को यह आदेश लिखा था, ने समीक्षा से इंकार किया, जबकि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने मामले को खुली अदालत में सुनने की सहमति जताई। दोनों जजों ने याचिका पर चैंबर में विचार किया था।

महाराष्ट्र सरकार का तर्क था कि धार्मिक आधार पर एसआईटी गठित करने का निर्देश "संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता" के सिद्धांत के विपरीत है और इससे सरकारी अधिकारियों की निष्ठा पर सवाल खड़े होते हैं। लेकिन न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि पहले के आदेश में स्पष्ट रूप से पुलिस की निष्पक्षता और सतर्कता पर सवाल उठाए गए थे। उन्होंने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट था कि पुलिस अधिकारियों ने संज्ञान योग्य अपराध की सूचना मिलने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की और कार्रवाई करने में लापरवाही बरती। न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि दंगे का मामला दो समुदायों से जुड़ा था और उसमें धार्मिक पक्ष स्पष्ट दिखाई दे रहा था, इसलिए पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए हिंदू और मुस्लिम अधिकारियों की संयुक्त एसआईटी बनाना आवश्यक था। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश महाराष्ट्र पुलिस ने इस दिशा में आवश्यक कदम नहीं उठाए। वहीं, न्यायमूर्ति शर्मा की राय में राज्य सरकार की आपत्तियों पर खुली अदालत में सुनवाई जरूरी है ताकि संस्थागत निष्पक्षता के सिद्धांत की गहराई से समीक्षा की जा सके। इस प्रकार, मामला अब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के पास भेजे जाने की संभावना है।
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न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा – पूर्व कानून मंत्री एके सेन के जीवन से न्यायपालिका को लेनी चाहिए सीख
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने शुक्रवार को कहा कि देश के सबसे लंबे समय तक कानून मंत्री रहे अशोक कुमार सेन (ए.के. सेन) के जीवन और कार्य से न्यायाधीशों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि सेन का शांत नेतृत्व और न्याय सुधार के प्रति समर्पण आज भी एक मिसाल है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ‘ए.के. सेन मेमोरियल लेक्चर’ में बोलते हुए न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि सेन का कानून और शासन को देखने का तरीका न्यायपालिका के लिए स्थायी सीख है।

उन्होंने कहा सेन असहमति को बिना आवाज उठाए संभालते थे। वे हर चिंता को सुनते थे, लेकिन बहस को बहाना बनाकर निर्णय में देरी नहीं करते थे। उनका मानना था कि स्पष्टता अपने आप में एक सम्मान है, संसद, अदालत और जनता के लिए भी। न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि न्यायाधीशों को भी यही सिद्धांत अपनाना चाहिए, स्पष्ट कारण, संतुलित भाषा और ऐसे निर्णय जिनको आम लोग समझ सकें। उन्होंने कहा कि संविधान सबके लिए बोलता है, इसलिए हमारे फैसले भी सबके लिए समझने योग्य होने चाहिए।

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