आपराधिक आरोप झेल रहे व्यक्ति के स्वतंत्रता अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत तीन युवकों के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जीवन और स्वतंत्रा के अधिकार को सिर्फ इस वजह से अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि संबंधित व्यक्ति आपराधिक मामलों का सामना कर रहा है। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा, इन लोगों के खिलाफ यूपी गैंग्गस्टर एंड एंटी सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट के तहत दर्ज किया गया मामला औसत या मध्यम नहीं बल्कि बेहद गंभीर प्रकृति का है। पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि संबंधित मामले के लिए जरूरी गंभीरता को न्यायिक रूप से सीमित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हर मामले की अपनी विशिष्टताओं पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिली जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी को केवल इस कारण से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं।
पीठ ने कहा, जब किसी कानून को लागू करने की बात आती है तो संबंधित अधिकारियों को कोई भी निरंकुश विवेक देना स्पष्ट रूप से नासमझी होगी। प्रावधान जितना अधिक कठोर या दंडात्मक होगा, उसे लागू करने की आवश्यकता का परीक्षण भी उतना ही सख्त होगा। यह कहते हुए पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 17 जनवरी, 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने तीन व्यक्तियों - जय किशन, कुलदीप कटारा और कृष्णा कटारा के खिलाफ एफआईआर को रद्द करने से इन्कार कर दिया था। इन्होंने इस आधार पर शीर्ष अदालत का रुख किया कि उनके खिलाफ दर्ज शुरुआती तीन प्राथमिकियां दो परिवारों के बीच संपत्ति के विवाद से संबंधित थीं और आरोपों की प्रकृति दीवानी किस्म की थी। ऐसे में गैंग्गस्टर एक्ट के तहत हो रही कार्यवाही रद्द की जानी चाहिए।