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SC Updates: छह साल की बच्ची की कस्टडी पिता को सौंपने में HC ने न्याय का मजाक उड़ाया, SC की सख्त टिप्पणी

Fri, 06 Dec 2024 10:05 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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सुप्रीम कोर्ट ने एक वैवाहिक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2019 में सुनाए फैसले को गलत बताते हुए कहा कि छह साल की बच्ची की कस्टडी उसके जैविक पिता को सौंपकर न्याय का मजाक उड़ाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निपटाने का सबसे अनुचित तरीका था।

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जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने मामले के रिकॉर्ड को देखने के बाद नाराजगी जाहिर की। पीठ ने कहा, अगर हम कुछ भी कठोर कहेंगे, तो बार के सदस्य कहेंगे कि हम हाईकोर्ट का मनोबल गिरा रहे हैं। लेकिन देखिये इस मामले में हाईकोर्ट ने न्याय का कैसा मजाक उड़ाया है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, हम जितना कम बोलेंगे, उतना अच्छा होगा, क्योंकि इससे न्यायिक व्यवस्था की स्थिति का पता चलता है।

पीठ ने कहा, इस मामले में मां को उसके ससुराल से निकाल दिया गया। बच्चे को उसके पति ने अपने पास रख लिया। जब उसने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, तो हाईकोर्ट के एकल जज ने उसके पक्ष में सही फैसला दिया, लेकिन बच्चे के पिता की अपील पर खंडपीठ ने 2019 में आदेश पर रोक लगा दी। अब पांच साल बाद हाईकोर्ट ने फैसला किया है कि बच्चे की कस्टडी मां को देने के एकल जज के आदेश पर रोक लगाने वाला 2019 का उसका आदेश गलत था।
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बुलंदशहर के डीएम को जांच कर बच्ची के सर्वोत्तम हित बताने का निर्देश
पीठ ने बुलंदशहर के जिला न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वे जांच करके पुष्टि करें और रिपोर्ट दें कि बच्चे के सर्वोत्तम हित और कल्याण में क्या होगा। पिता के वकील ने बताया कि मां उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाना चाहती थी, जिससे जाहिर तौर पर उनके बीच मनमुटाव हुआ। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का मां का निर्णय बच्चे के बेहतर भविष्य और जीवनयापन के लिए था, लेकिन इसके बजाय उसे ससुराल से ही निकाल दिया गया।

हाशिमपुरा कांड : सुप्रीम कोर्ट ने 8 दोषियों को दी जमानत

Supreme Court - फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने 1987 में प्रादेशिक आर्म्ड कान्स्टेबुलरी (पीएसी) के कर्मियों द्वारा 38 लोगों की कथित हत्या से जुड़े हाशिमपुरा नरसंहार मामले में आठ दोषियों को शुक्रवार को जमानत दे दी। जस्टिस अभयएस ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने चार दोषियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी की इन दलीलों पर गौर किया कि उन्हें बरी करने के निचली अदालत के फैसले को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पलटे जाने के बाद से वे लंबे समय से कारावास में रह रहे हैं।

क्या है मामला?
हाशिमपुरा नरसंहार 22 मई 1987 को हुआ था, जब पीएसी की 41वीं बटालियन की ‘सी-कंपनी’ के जवानों ने सांप्रदायिक तनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में मेरठ के हाशिमपुरा इलाके से लगभग 50 मुस्लिम पुरुषों को कथित तौर पर घेर लिया था। पीड़ितों को शहर के बाहरी इलाके में ले जाया गया, जहां उन्हें गोली मार दी गई और उनके शवों को एक नहर में फेंक दिया गया। इस घटना में 38 लोगों की मौत हो गई थी तथा केवल पांच लोग ही इस भयावह घटना को बयां करने के लिए बचे।

याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं समी उल्लाह, निरंजन लाल, महेश प्रसाद और जयपाल सिंह का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता तिवारी ने शुक्रवार को तर्क दिया कि अपीलकर्ता हाईकोर्ट के फैसले के बाद से छह साल से अधिक समय से जेल में हैं। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ताओं को पहले अधीनस्थ अदालत द्वारा बरी किया जा चुका है तथा अधीनस्थ अदालत में सुनवाई और अपील प्रक्रिया के दौरान उनका आचरण अच्छा रहा है।

शीघ्र सुनवाई मौलिक अधिकार है- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि मुकदमे का शीघ्र निपटारा एक मौलिक अधिकार है और विचाराधीन कैदी को अनिश्चितकालीन कारावास में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस हृषिकेश रॉय और पंकज मिथल की पीठ ने बिहार में दर्ज एक मामले में करीब 4.2 साल से हिरासत में रहे एक व्यक्ति को जमानत दे दी, क्योंकि उसने कहा कि मामले की सुनवाई जल्द खत्म नहीं होगी।

शीर्ष अदालत का यह आदेश रौशन सिंह नामक व्यक्ति की याचिका पर आया, जिसने पटना उच्च न्यायालय के जून के फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। पीठ ने कहा, विचाराधीन कैदी को अनिश्चितकालीन कारावास में नहीं रखा जा सकता। मुकदमे का शीघ्र निपटारा एक मौलिक अधिकार है, जिसे हमारे न्यायशास्त्र में अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त है। रौशन सिंह के वकील ने पीठ को बताया कि याचिकाकर्ता अक्तूबर, 2020 में अपनी गिरफ्तारी के बाद से हिरासत में है और मामले की सुनवाई अभी भी अनिर्णीत है।

राज्य की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि मामले में अभियोजन पक्ष के तीन और गवाहों से पूछताछ की जानी है। पीठ ने राज्य के वकील के अनुसार, मामले में एक आरोपी की तरफ से दाखिल डिस्चार्ज आवेदन के कारण मुकदमे में देरी हुई। पीठ ने कहा, कारावास की अवधि और इस तथ्य पर विचार करने के बाद कि मुकदमा निकट तिथि पर समाप्त नहीं हो सकता है, हम याचिकाकर्ता - रौशन सिंह को जमानत देना उचित समझते हैं। पीठ ने कहा, साथ ही कहा कि ट्रायल कोर्ट की तरफ से उचित जमानत शर्तें लगाई जानी चाहिए।

पहले उनकी जमानत याचिका को खारिज करते हुए, उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह मुकदमे को यथासंभव शीघ्रता से, अधिमानतः छह महीने के भीतर समाप्त करे।

लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं के लिए जगह है लेकिन वे संविधान के अनुरूप होनी चाहिए: न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं के लिए हमेशा जगह होती है लेकिन उन मान्यताओं का संविधान के अनुरूप होना जरूरी है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने एक वकील की जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में केंद्र और 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया' को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया था कि बार निकायों के चुनाव लड़ने वालों को किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होना चाहिए।

पीठ ने कहा, 'लोकतंत्र में अलग-अलग विचारधाराओं के लिए हमेशा गुंजाइश होती है लेकिन यह संविधान के अनुरूप होना चाहिए। ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी राजनीतिक दल के सक्रिय सदस्य को बार निकायों का चुनाव लड़ने से रोकता हो। आप चाहते हैं कि कानून बनाया जाए। माफ कीजिए, ऐसा नहीं किया जा सकता।'

वरिष्ठ अधिवक्ता सिराजुद्दीन ने जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता जया सुकिन की ओर से मामले की पैरवी की। पीठ ने टिप्पणी की, 'यदि बार के किसी पदाधिकारी की कोई राजनीतिक विचारधारा है तो इसमें गलत क्या है? आप कपिल सिब्बल को एससीबीए (सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन) के अध्यक्ष पद से हटाना चाहते हैं? आप (मनन कुमार) मिश्रा (बिहार से राज्यसभा सदस्य) को 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया' के अध्यक्ष पद से हटाना चाहते हैं?'

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कानूनविद राम जेठमलानी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि दिवंगत जेठमलानी 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया' के अध्यक्ष थे और उन्होंने एससीबीए के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया था। पीठ ने कहा, 'वह संसद सदस्य भी थे और विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े थे। क्या आप चाहते हैं कि देश इन प्रतिभाशाली व्यक्तियों के विचारों और योगदान से वंचित रहे? बार निकाय समाज के कुलीन सदस्यों का एक समूह है। हमें नहीं लगता कि राजनीतिक दलों के साथ जुड़ाव का कोई प्रभाव पड़ेगा।' शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कानून इस मुद्दे पर चुप है तो वह किसी राजनीतिक दल से जुड़े व्यक्ति को बार निकाय का चुनाव न लड़ने के लिए कैसे कह सकती है।

आईसीसी सदस्यों की नौकरी की सुरक्षा के लिए याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न कानून के तहत गठित आंतरिक शिकायत समितियों के सदस्यों की सेवा शर्तों को सुरक्षित करने की मांग वाली याचिका की जांच करने पर सहमति जताई। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने जानकी चौधरी की तरफ से दायर याचिका पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और अन्य को नोटिस जारी किया।

जनहित याचिका में निजी कार्यस्थलों पर कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (पीओएसएच अधिनियम) के तहत गठित आंतरिक शिकायत समितियों (आईसीसी) के सदस्यों के लिए कार्यकाल की सुरक्षा और प्रतिशोध से सुरक्षा की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता आभा सिंह ने कहा कि यह मुद्दा संवेदनशील है और कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक खुद आईसीसी की अध्यक्ष हैं और उन्हें निजी कार्यस्थलों पर समिति के सदस्यों के सामने आने वाली चुनौतियों का प्रत्यक्ष अनुभव है। मुख्य याचिकाकर्ता जानकी चौधरी आईसीसी समिति की पूर्व सदस्य हैं और सह-याचिकाकर्ता ओल्गा टेलिस सेवानिवृत्त पत्रकार हैं, जिन्होंने अधिवक्ता मुनव्वर नसीम के माध्यम से दायर अपनी जनहित याचिका में दावा किया है कि निजी क्षेत्र में महिला आईसीसी सदस्यों को सार्वजनिक क्षेत्र के आईसीसी सदस्यों के समान सुरक्षा और कार्यकाल की सुरक्षा का अधिकार नहीं है।

 
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क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की जमानत याचिका पर सीबीआई से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कथित बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल जेम्स द्वारा 3,600 करोड़ रुपये के अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में जमानत के लिए दायर याचिका पर सीबीआई से जवाब मांगा। जस्टिस विक्रम नाथ और पीबी वराले की पीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर याचिका पर जवाब मांगा है। जेम्स ने दिल्ली हाईकोर्ट के 25 सितंबर के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है। इसमें मामले में उसे जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। कथित घोटाला अगस्ता वेस्टलैंड से 12 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद से जुड़ा है। ब्रिटिश नागरिक जेम्स को दिसंबर 2018 में दुबई से प्रत्यर्पित किया गया था और बाद में गिरफ्तार कर लिया गया था।
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