क्या सांसदों या विधायकों को आपराधिक मामले में आरोप तय होने पर ही अयोग्य ठहराया जाना चाहिए या दोषसिद्धि के बाद? इस मसले का निपटारा अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ करेगी। न्यायमूर्ति तरूण गोगई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मंगलवार को इस मसले को संविधान पीठ के पास भेजते हुए कहा कि यह उचित होगा कि इस मसले का निपटारा संविधान पीठ करें।
पीठ पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन और जेएम लिंगदोह द्वारा दाखिल जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया कि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने पर सांसदों या विधायकों को अयोग्य ठहराने की बजाए आरोप तय होते ही उन्हें अयोग्य ठहराया जाना चाहिए।
आरोप तय होने का मतलब यह होता है कि न्यायालय को प्रथम दृष्टया लगता है कि आरोपी के खिलाफ ऐसे सबूत हैं जिससे कि उनके खिलाफ मुकदमा चलना चाहिए। ऐसे में सांसदों या विधायकों की सदस्यता खत्म होनी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि आपराधिक छवि वालों को सांसद या विधायक बनने से रोका जाना चाहिए और उन्हें मंत्री नहीं बनाना चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि किसे विधायक या सांसद बनाया जाए, यह अदालत का काम नहीं है।
साथ ही पीठ ने यह भी कहा कि किसे मंत्री बनाया जाना चाहिए और किसे नहीं, यह निर्धारित करना न्यायालय का काम नहीं है। मालूम हो कि इससे पहले वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने पर सांसदों या विधायकों की सदस्यस्ता तत्काल खत्म हो जाएगी।