सुप्रीम कोर्ट आठ मई को गुजरात के 68 निचले न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति को चुनौती देने वाली एक याचिका पर कथित रूप से "मेरिट कम सिनियॉरिटी" की अवहेलना करने के आधार पर सुनवाई करेगा। इन न्यायिक अधिकारियों में सूरत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) हरीश हसमुखभाई वर्मा का नाम भी शामिल है। वर्मा ने मानहानि के एक मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दोषी ठहराया था।
न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने एक मई को जिला न्यायाधीशों के उच्च कैडर में 68 न्यायिक अधिकारियों के चयन को चुनौती देने वाले वरिष्ठ सिविल जज कैडर के अधिकारियों रविकुमार मेहता और सचिन प्रतापराय मेहता की याचिका को सोमवार को सुनवाई के लिए तय किया था।
दो अफसरों ने प्रमोशन को दी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में गुजरात के सीनियर सिविल जज कैडर के दो न्यायिक अफसरों रवि कुमार मेहता और सचिन प्रतापराय मेहता ने याचिका दायर की है। रवि कुमार मेहता गुजरात सरकार के लीगल डिपार्टमेंट में अंडर सेक्रेटरी के पद पर तैनात हैं। वहीं, सचिन प्रतापराय मेहता गुजरात स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं। दोनों अफसरों ने अपनी याचिका में मांग की है कि हरीश हसमुखभाई वर्मा समेत 68 अफसरों के प्रमोशन को रद्द किया जाए और नए सिरे से मेरिट कम सिनियॉरिटी आधार पर लिस्ट तैयार की जाए।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि कई ऐसे अभ्यर्थी हैं जिन्होंने प्रमोशन के लिए हुई परीक्षा में ज्यादा अंक हासिल किए, लेकिन उनका सेलेक्शन नहीं हुआ। बल्कि उनसे कम अंक हासिल करने वाले कैंडिडेट को प्रमोट कर दिया गया। बता दें कि हरीश हसमुखभाई वर्मा का प्रमोशन के बाद ट्रांसफर भी कर दिया गया था और उन्हें राजकोट जिला न्यायालय में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज नियुक्त किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट जता चुका है नाराजगी
दोनों न्यायिक अधिकारियों की याचिका पर 13 अप्रैल को राज्य सरकार और गुजरात उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने 68 अधिकारियों की पदोन्नति के लिए 18 अप्रैल को पारित राज्य सरकार के आदेश पर नाखुशी जताई थी। शीर्ष अदालत ने अपने 28 अप्रैल के आदेश में कहा था, बड़े दुर्भाग्य की बात है कि प्रतिवादियों, विशेष रूप से राज्य सरकार को मौजूदा कार्यवाही की जानकारी है और इस तथ्य की भी जानकारी है कि मौजूदा कार्यवाही में इस अदालत ने नोटिस जारी कर 28 अप्रैल तक जवाब देने को कहा है, उसके बावजूद राज्य सरकार ने 18 अप्रैल, 2023 यानी मौजूदा कार्यवाही में इस अदालत द्वारा जारी नोटिस पाने की तारीख के बाद पदोन्नति आदेश जारी किया है।
न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार ने पदोन्नति आदेश में यह भी कहा है कि शीर्ष अदालत में लंबित कार्यवाही के परिणाम पर यह निर्भर करेगा। उसने कहा, हमें यह जल्दबाजी समझ नहीं आई जिसमें राज्य सरकार ने पदोन्नति आदेश को मंजूरी दी और पारित किया...जबकि मामला इस अदालत के समक्ष है और नोटिस जारी करते समय विस्तृत आदेश दिया गया था। आदेश के अनुसार गौर करने वाली बात है कि चयन 2022 में हुआ और इस प्रकार पदोन्नति आदेश जारी करने की कोई अत्यंत आवश्यकता नहीं थी।
याचिका में कहा गया है कि भर्ती नियमों के अनुसार जिला न्यायाधीश के पद को योग्यता-सह-वरिष्ठता के सिद्धांत के आधार पर और उचित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 65 प्रतिशत आरक्षण को ध्यान में रखते हुए भरा जाता है। याचिका के अनुसार योग्यता-सह-वरिष्ठता के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया और वरिष्ठता-सह-योग्यता के सिद्धांत पर भर्तियां की जा रही है। दोनों न्यायिक अधिकारियों ने परीक्षा में 200 में से क्रमश: 135.5 और 148.5 अंक प्राप्त किए थे। उन्होंने कहा कि कम अंक वाले उम्मीदवारों को जिला न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।
जज वर्मा को कैसे मिला प्रमोशन?
सीजेएम सूरत वर्मा ने 23 मार्च को राहुल गांधी को 2019 के एक आपराधिक मानहानि मामले में दोषी ठहराया था और दो साल कारावास की सजा सुनाई थी। मामला राहुल की ‘मोदी उपनाम’ वाली टिप्पणी से जुड़ा है। हरीश हसमुखभाई वर्मा की बात करें तो उन्हें 200 अंकों की इस परीक्षा में 127 अंक मिले थे और सीनियर सिविल जज से डिस्ट्रिक्ट जज कैडर में प्रमोशन के योग्य पाए गए थे।
कौन हैं जस्टिस वर्मा?
हरीश हसमुखभाई वर्मा मूल रूप से गुजरात के वडोदरा के रहने वाले हैं। उन्होंने कानून (एलएलबी) की पढ़ाई गुजरात के बहुचर्चित महाराजा सयाजीराव कॉलेज से की है। 43 वर्षीय हरीश हसमुखभाई वर्मा एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद ज्यूडिशियल सेवा में आए। जस्टिस वर्मा के पिता भी दिग्गज वकील रहे हैं। न्यायिक गलियारों में जस्टिस वर्मा की गिनती तेज-तर्रार जज के तौर पर होती है।