अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की रक्षा तथा उन्हें अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करने के मद्देनजर केंद्र सरकार ने आज लोकसभा में एक संशोधन विधेयक पेश किया।
इस संबंध में पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय के एक फैसले को लेकर संबंधित समुदायों ने कड़ा विरोध किया था। इसी के मद्देनजर सरकार यह संशोधन विधेयक लेकर आयी है जिसमें विधेयक के उस मूल प्रावधान को बहाल कर दिया गया है जिसके तहत इन जातियों के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार के आरोपी को तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने आज सदन में यह विधेयक पेश किया।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला दिया था कि किसी अपराध के किए जाने के संबंध में एफआईआर रजिस्टर करने से पहले पुलिस उपाधीक्षक द्वारा एक प्रारंभिक जांच की जाएगी और ऐसे अपराध के संबंध में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से पहले किसी उचित प्राधिकार से अनुमति लेनी होगी।
इस फैसले ने पूर्व के कानून के कुछ प्रावधानों को कमजोर कर दिया था जो अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों को अत्याचार से संरक्षा और सुरक्षा प्रदान करता है।
विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों में बताया गया है कि एक बार जब जांच अधिकारी के पास यह संदेह करने का कारण है कि कोई अपराध किया गया है तो वह आरोपी को गिरफ्तार कर सकता है। जांच अधिकारी से गिरफ्तार करने या नहीं करने का विशेष अधिकार नहीं छीना जा सकता ।