उधर, सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से भी यह सवाल किया कि आखिर दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को आरोपमुक्त करने के 12 वर्ष बीत जाने केबाद भी एजेंसी ने अपील क्यों नहीं दायर की।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने गौर किया कि सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को लेकर विशेष अनुमति याचिका(एसएलपी) दायर नहीं की।
जवाब में सीबीआई की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने कहा कि यह सही है कि सीबीआई ने सही वक्त पर अपील नहीं दायर की। वास्तव में सीबीआई ने एसएलपी दायर की थी लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया था। सीबीआई इस पर चुप रही कि वह अपील दाखिल करना चाहती है या नहीं।
पीठ ने याचिकाकर्ता वकील अजय अग्रवाल से सवाल किया कि आखिरकार उनकी याचिका पर कैसे सुनवाई की जा सकती है। पीठ ने कहा कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष या पीड़ित के करीबी अपील दायर कर सकता है।
तीसरा पक्ष आखिर कैसे आपराधिक अपील दायर कर सकता है। जवाब में अजय अग्रवाल ने कहा कि बोफोर्स मामले में देश पीड़ित है। उन्होंने कहा कि सीबीआई को अपील दायर करनी चाहिए थी लेकिन उसने यह नहीं किया। उन्होंने कहा कि सीबीआई से पूछा जाना चाहिए कि आखिर उसने एसएलपी क्यों नहीं दायर की।
पीठ ने सुनवाई की तारीख दो फरवरी तक के लिए टालते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि वह अगली तारीख पर कानूनी पक्षों को ध्यान में रखते हुए हमें बताए कि आखिर उनकी याचिका पर क्यों सुनवाई होनी चाहिए। आखिर तीसरे पक्ष द्वारा दायर आपराधिक अपील को क्यों सुना जाना चाहिए।
सुनवाई केदौरान पीठ ने यह भी कहा कि अदालत का इस्तेमाल राजनीतिक लड़ाई और लोकप्रियता के लिए किया जाता है। ऐसे में जरूरी है कि अदालत कानूनी पहलू तक ही सीमित रहे। पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह की याचिका को अधिक समय लंबित रखने का कोई कारण नहीं है।
मालूम हो कि 31 मई, 2005 को दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन हिन्दुजा भाइयों और बोफोर्स कंपनी को आरोपमुक्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उसकी वजह से 250 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ।
वहीं इससे पहले फरवरी 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को आरोपमुक्त करते हुए बोफोर्स कंपनी पर धोखाधड़ी का आरोप तय करने का निर्देश दिया था।